ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से **$100** प्रति बैरल के करीब पहुंच रही हैं। मिडिल ईस्ट और रूस में जारी तनाव के कारण सप्लाई चेन पर बुरा असर पड़ा है, जिससे भारत की महंगाई और इंपोर्ट बिल के बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
ग्लोबल ऑयल मार्केट में इस वक्त भारी उठापटक जारी है। मध्य पूर्व (Middle East) में बढ़ते तनाव और रूसी ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को हुए नुकसान के चलते मार्केट में सप्लाई की किल्लत बढ़ गई है। 2026 की तीसरी तिमाही के लिए ग्लोबल ऑयल सप्लाई डेफिसिट का अनुमान 18 लाख बैरल प्रति दिन लगाया गया है। विशेष रूप से हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के रास्ते तेल की सप्लाई में अनिश्चितता ने रिफाइनरीज के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर मार
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में इंपोर्ट पर निर्भर है, इसलिए कीमतों का यह उछाल सीधे तौर पर देश के ट्रेड बैलेंस को प्रभावित करता है। आंकड़ों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में $1 की प्रति बैरल बढ़ोतरी से भारत के सालाना इंपोर्ट बिल पर लगभग ₹18,000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ बढ़ जाता है। यह स्थिति न केवल करंट अकाउंट डेफिसिट पर दबाव डालती है, बल्कि भविष्य में ईंधन की कीमतें बढ़ने पर आम जनता पर महंगाई की मार भी बढ़ा सकती है।
रूस की उत्पादन क्षमता में गिरावट
सप्लाई कम होने की एक मुख्य वजह रूस का गिरता उत्पादन है। वहां इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों के कारण क्रूड प्रोसेसिंग रेट पिछले 24 सालों के निचले स्तर पर आ गए हैं। इसका सीधा मतलब है कि ग्लोबल बायर्स के पास विकल्प कम हो रहे हैं, जिससे तेल की कीमतों में प्रीमियम और तेज हो रहा है।
बाजार के जानकारों का मानना है कि यदि ये तनाव 2027 तक जारी रहते हैं, तो ऊर्जा लागत लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती है। निवेशकों की नजरें अब इस पर टिकी हैं कि सरकार फ्यूल प्राइसिंग को लेकर क्या दखल देती है और देश में मुद्रास्फीति (Inflation) की क्या स्थिति रहती है।
