Brent Crude $100 के पार, भू-राजनीतिक तनाव के कारण तेल कीमतों में आई तूफानी तेज़ी

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Brent Crude $100 के पार, भू-राजनीतिक तनाव के कारण तेल कीमतों में आई तूफानी तेज़ी

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और शिपिंग मार्गों में व्यवधान के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। तेल की कीमतों में यह तेज उछाल भारतीय तेल मार्केटिंग कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है, क्योंकि ईंधन और एलपीजी की बिक्री पर होने वाले नुकसान (under-recoveries) के चलते उनके मुनाफे पर फिर से दबाव बढ़ेगा।

Detailed Coverage

क्यों बढ़ी तेल की कीमतें?

गुरुवार को वैश्विक तेल की कीमतों ने नौ हफ्तों का उच्चतम स्तर छुआ। ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स $100.71 प्रति बैरल तक पहुंच गया। यह लगभग 7% की एक दिन की सबसे बड़ी उछाल है। इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के साथ-साथ बाब अल-मंदेब स्ट्रेट (Bab el-Mandeb Strait) में शिपिंग जहाजों पर हो रहे हमले हैं। इन घटनाओं ने ऊर्जा सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे बाजार को ज्यादा फ्रेट कॉस्ट (freight costs) और सऊदी अरब जैसे प्रमुख उत्पादकों से सप्लाई में देरी का अंदेशा सता रहा है।

भारतीय तेल कंपनियों पर असर

भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) जैसी भारतीय तेल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के लिए कच्चे तेल की कीमतों में यह अचानक उछाल सीधा वित्तीय दबाव बना रहा है। जून में जब वैश्विक कीमतें कुछ नरम पड़ी थीं, तब इन कंपनियों को थोड़ी राहत मिली थी। लेकिन अब कीमतों में आई इस तेजी से वे फायदे फिर से गंवाने के कगार पर हैं। तेल कंपनियां अक्सर घरेलू उपभोक्ताओं पर बढ़ी हुई वैश्विक कीमतों का पूरा बोझ तुरंत नहीं डाल पाती हैं, जिससे 'अंडर-रिकवरी' (under-recoveries) यानी लागत से कम दाम पर ईंधन बेचने से होने वाले नुकसान की स्थिति फिर पैदा हो सकती है।

जून तिमाही के वित्तीय आंकड़े इन कंपनियों की कमजोरी को उजागर करते हैं। HPCL और BPCL ने अकेले उसी अवधि में ₹14,000 करोड़ से अधिक का कुल नुकसान दर्ज किया था, जिसमें अकेले एलपीजी (LPG) की बिक्री से ₹7,000 करोड़ से ज्यादा का नुकसान शामिल था। अब जब कच्चा तेल $100 के पार चला गया है, तो विश्लेषकों और कंपनी के अधिकारियों को चिंता है कि अगर वैश्विक अस्थिरता जारी रहती है तो आने वाले महीनों में यह नुकसान और बढ़ सकता है।

शिपिंग का खतरा और सप्लाई चेन की चुनौतियां

सिर्फ तेल की बेस प्राइस (base price) ही नहीं, बल्कि बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के पास शिपिंग मार्गों में आई रुकावट ने ऑपरेशनल दिक्कतों को और बढ़ा दिया है। भारत का एक बड़ा हिस्सा कच्चा तेल इन्हीं समुद्री रास्तों से आता है। जैसे-जैसे जहाज संघर्ष वाले इलाकों से बचकर निकलने को मजबूर हो रहे हैं, बीमा प्रीमियम (insurance premiums) और परिवहन समय में वृद्धि हो रही है, जिससे भारतीय रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल की अंतिम लागत बढ़ रही है।

अनिश्चितता को और बढ़ाते हुए तेल की सोर्सिंग (sourcing) का बदलता स्वरूप भी सामने आया है। रेटिंग एजेंसी ICRA के हालिया आंकड़ों के अनुसार, सऊदी अरब भारत का तीसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता (supplier) बनकर उभरा है, जो रेड सी (Red Sea) के बंदरगाहों से बड़ी मात्रा में तेल भेज रहा है। इन विशिष्ट समुद्री मार्गों पर किसी भी तरह का खतरा इन सप्लाई रूट्स को महंगा या लॉजिस्टिकली (logistically) अधिक चुनौतीपूर्ण बना सकता है। इसके अलावा, रिपोर्टों से पता चलता है कि रूसी क्रूड (Russian crude) पर पहले जो डिस्काउंट (discount) मिल रहा था, वह अब उपलब्ध नहीं है, जिससे साल की शुरुआत में रिफाइनरी मार्जिन (refinery margins) को सहारा देने वाला एक महत्वपूर्ण लागत-कुशन (cost-cushion) खत्म हो गया है।

निवेशकों को आने वाली तिमाही नतीजों पर बारीकी से नजर रखनी होगी कि ये कंपनियां सरकारी-विनियमित (government-regulated) ईंधन की कीमतों और कच्चे माल की बढ़ती लागत के बीच कैसे संतुलन बनाती हैं। मैनेजमेंट की कमेंट्री (commentary) पर ईंधन मार्केटिंग मार्जिन, एलपीजी (LPG) के लिए सरकारी सब्सिडी (subsidy) समर्थन में कोई बदलाव, और पश्चिम एशियाई शिपिंग चैनलों में वर्तमान व्यवधान की अवधि पर प्रमुख अपडेट देखने होंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.