मिडिल ईस्ट में भू-राजनीतिक तनाव और सऊदी अरब की एनर्जी फैसिलिटी पर हमलों के बाद Brent crude की कीमतें पहली बार **$100** प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई हैं। सप्लाई घटने की खबरों के बीच ग्लोबल ब्रोकरेज ने अपने अनुमान बढ़ा दिए हैं, जिसका सीधा असर भारत की महंगाई और करेंसी पर पड़ सकता है।
सप्लाई चेन में बड़ी रुकावट
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का सीधा असर ग्लोबल सप्लाई चेन पर पड़ा है। कच्चे तेल के ट्रांसपोर्ट के लिए सबसे अहम 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) के जरिए सप्लाई 9 मिलियन बैरल प्रतिदिन से घटकर अब 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन से भी कम रह गई है। रेड सी (Red Sea) पर बढ़ते खतरों के चलते ग्लोबल सप्लाई में करीब 4.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन की कमी का अनुमान है, जिससे मार्केट में स्ट्रक्चरल डेफिसिट पैदा हो गया है।
ग्लोबल मार्केट की प्रतिक्रिया
Goldman Sachs, HSBC और Bank of America जैसे दिग्गज ग्लोबल फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स ने इस रिस्क को देखते हुए अपने प्राइस फोरकास्ट को अपडेट किया है। मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि डिप्लोमैटिक हल निकलने तक क्रूड में जबरदस्त वोलैटिलिटी (Volatility) बनी रहेगी।
भारतीय अर्थव्यवस्था और निवेशकों पर असर
भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल इम्पोर्ट करता है, इसलिए कीमतों में यह उछाल हमारे इंपोर्ट बिल को बढ़ाएगा और रुपये पर दबाव डालेगा।
किस पर होगा बुरा असर: एयरलाइंस, पेंट और टायर बनाने वाली कंपनियों के लिए रॉ मटेरियल महंगा होगा, जिससे मार्जिन पर असर पड़ेगा। RBI के लिए भी यह महंगाई का बड़ा सिरदर्द बन सकता है, जो इंटरेस्ट रेट तय करते समय इसे बारीकी से देखता है।
किसे होगा फायदा: ONGC और Oil India जैसी अपस्ट्रीम कंपनियां अपने क्रूड सेल पर बेहतर रिलाइजेशन देख सकती हैं। हालांकि, Indian Oil, HPCL और BPCL जैसी OMCs के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है, क्योंकि उन्हें ग्लोबल क्रूड कॉस्ट और रिटेल पेट्रोल-डीजल की कीमतों के बीच बैलेंस बनाना होगा।
निवेशकों को सलाह है कि वे ट्रेड बैलेंस रिपोर्ट्स, करेंसी की चाल और कंपनियों के मैनेजमेंट कमेंट्री पर नजर बनाए रखें, ताकि यह समझ सकें कि कंपनियां बढ़ती लागत का बोझ ग्राहकों पर कितना डाल पा रही हैं।
