इस तूफानी तेजी की मुख्य वजह अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड टेंशन (Trade Tension) में नरमी आने की उम्मीद है। जैसे ही लूनर न्यू ईयर (Lunar New Year) की छुट्टियों के बाद चीन के बाज़ारों ने वापसी की, निवेशकों का सेंटीमेंट (Sentiment) एकदम बदल गया। बाज़ार इस बात की उम्मीद कर रहे हैं कि अमेरिका, चीन पर लगे भारी भरकम टैरिफ (Tariff) को कम कर सकता है।
मॉर्गन स्टैनली (Morgan Stanley) के अनुमान के मुताबिक, इस कदम से चीन के आयात पर लगने वाले औसत टैरिफ (Average Tariff) को मौजूदा 32% से घटाकर 24% किया जा सकता है। इस खबर ने मेटल्स (Metals) के लिए एक बुलिश (Bullish) माहौल बना दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि इससे मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) सेक्टर की डिमांड (Demand) में रिकवरी (Recovery) आ सकती है। चीन के CSI 300 इंडेक्स (Index) में भी शुरुआती कारोबार में इसका असर दिखा। मंगलवार, 24 फरवरी 2026 तक, LME कॉपर (Copper) 2.3% चढ़कर $13,158.50 प्रति टन पर पहुँच गया, जबकि एल्युमीनियम (Aluminium) 0.9% बढ़कर $3,118.50 प्रति टन रहा। यह तेज़ी कॉपर को जनवरी में उसके ऑल-टाइम हाई (All-time High) के करीब ले आई है।
लेकिन, इस तेज़ी के बीच एक बड़ी चिंता भी मंडरा रही है। अनुमानित टैरिफ राहत की सट्टा खरीदारी (Speculative Buying) ने फिजिकल मार्केट (Physical Market) की हकीकत को पीछे छोड़ दिया है। चीन में फिजिकल डिमांड (Physical Demand) में उम्मीद के मुताबिक तेज़ी नहीं दिख रही है, जिसके चलते एक्सचेंज-मॉनीटर्ड इन्वेंटरी (Exchange-monitored Inventories) में भारी इजाफ़ा हुआ है। खासकर कॉपर, निकेल (Nickel) और टिन (Tin) का स्टॉक (Stock) इस समय में पिछले सालों के मुकाबले सबसे ज़्यादा है। LME कॉपर इन्वेंटरी तो इस साल की शुरुआत से अब तक 70% तक बढ़ी है और मार्च 2025 के बाद अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुँच गई है। यह दिखाता है कि मौजूदा प्राइस (Price) बढ़त असल खपत से थोड़ी अलग है, जो भविष्य में कीमतों पर दबाव डाल सकती है।
सेक्टर की बात करें तो, HSBC ग्लोबल रिसर्च (HSBC Global Research) के एनालिस्ट्स (Analysts) AI, EV डिमांड (EV Demand) और एनर्जी स्टोरेज (Energy Storage) जैसे स्ट्रक्चरल डिमांड ड्राइवर्स (Structural Demand Drivers) को देखते हुए कॉपर, एल्युमीनियम और प्रीशियस मेटल्स (Precious Metals) को पसंदीदा निवेश मान रहे हैं। हालाँकि, रॉयटर्स (Reuters) के एक पोल (Poll) के अनुसार, एल्युमीनियम में तो अच्छी बढ़त की उम्मीद है, लेकिन कॉपर, निकेल और टिन के लिए 2026 में कीमतें लगभग स्थिर रहने का अनुमान है। वर्ल्ड बैंक (World Bank) का कहना है कि 2027 तक बेस मेटल्स की सप्लाई (Supply) में कमी बनी रहेगी, जिससे कीमतें मजबूत रह सकती हैं। पर, चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में धीमी ग्रोथ (Growth) डिमांड पर असर डाल सकती है। भारत में Nifty Metal इंडेक्स (Index) का P/E रेश्यो (P/E Ratio) 20.3 है, जो सेक्टर के वैल्यूएशन (Valuation) के बारे में बताता है।
गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) जैसे ब्रोकरेज (Brokerage) पहले ही चेता चुके हैं कि मैन्युफैक्चरर्स (Manufacturers) की कमज़ोर डिमांड, खासकर चीन में, एक बड़ी चुनौती है। ऑर्डर बुक (Order Books) पतले हो रहे हैं और ग्रिड ऑर्डर (Grid Orders) में भी धीमी गति दिख रही है। अगर चीन में छुट्टियों के बाद की खपत उम्मीद से कम रहती है या ट्रेड टेंशन (Trade Tensions) फिर बढ़ती है, तो मौजूदा रैली (Rally) तेज़ी से पलट सकती है। भले ही एनर्जी ट्रांजिशन (Energy Transition) एक लॉन्ग-टर्म (Long-term) कारण है, लेकिन नियर-टर्म (Near-term) डिमांड कमज़ोर रही तो भारी इन्वेंटरी कीमतों पर भारी पड़ सकती है। ड्यूश बैंक (Deutsche Bank) का अनुमान है कि 2026 में कॉपर की औसत कीमत $12,125 प्रति मीट्रिक टन रह सकती है, जो दूसरी तिमाही तक $13,000 तक जा सकती है, लेकिन यह चीन की डिमांड पर निर्भर करेगा। ऐसे में, निवेशक सट्टागत चालों (Speculative Moves) के बजाय फंडामेंटल (Fundamentals) पर ज़्यादा ध्यान दें।