यह बड़ा कदम कंपनी की गंभीर वित्तीय परेशानी से निपटने के लिए उठाया जा रहा है, जिसमें कैश फ्लो में असंतुलन, बढ़ते खर्च और नकदी की भारी तंगी शामिल है। इस योजना के तहत, बैंकों और वित्तीय संस्थानों के बड़े कर्ज़ को शेयर्स (Shares) और कम्पलसरी कन्वर्टिबल प्रेफरेंस शेयर्स (CCPS) में बदला जाएगा, जो कंपनी की मालिकी और वित्तीय नींव को पूरी तरह बदलने वाला है।
कैपिटल स्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव
EGM की मीटिंग का मुख्य एजेंडा कंपनी के ऑथराइज़्ड शेयर कैपिटल (Share Capital) को ₹500 करोड़ से बढ़ाकर ₹13,000 करोड़ करना है। यह बड़ी बढ़ोतरी प्रस्तावित कर्ज़ को हिस्सेदारी में बदलने की योजना के लिए ज़रूरी है।
कर्ज़दारों की बढ़ेगी हिस्सेदारी
कर्ज़ देने वाले संस्थान अब कर्ज़ की रकम को कंपनी में हिस्सेदारी में बदलेंगे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगभग ₹570.03 करोड़ की देनदारियों (जैसे कि ऑप्शनली कन्वर्टिबल डिबेंचर्स पर YTM) को शेयर्स में बदला जाएगा। ये शेयर्स ₹5.12 प्रति शेयर के भाव पर दिए जाएंगे, जो कंपनी की मौजूदा मूल्यांकन (Valuation) की चुनौतियों को दर्शाता है। इस बदलाव के बाद, कर्जदार मिलकर कंपनी की लगभग 48.95% हिस्सेदारी पर कब्ज़ा कर लेंगे।
इसके अलावा, ₹2855.54 करोड़ की बाकी देनदारियों को CCPS में बदला जाएगा। इन CCPS पर बहुत ही मामूली 0.01% का कूपन रेट होगा और यह 20-साल की लंबी अवधि के लिए होंगे। अंत में, ये अनिवार्य रूप से शेयर्स में बदल जाएंगे, जिससे कर्जदारों का नियंत्रण और भी मज़बूत होगा।
मौजूदा शेयरधारकों के लिए चिंता
कंपनी ने खुद अपनी बेहद नाज़ुक वित्तीय स्थिति को स्वीकार किया है। कंपनी की फाइलिंग्स में 'कैश फ्लो में गड़बड़ी', 'ऑपरेटिंग मार्जिन पर भारी दबाव' और 'नकदी की किल्लत' जैसी बातों का ज़िक्र है, जिसने कर्ज़ चुकाने की क्षमता को बुरी तरह प्रभावित किया है।
कुल ₹3,400 करोड़ से ज़्यादा की यह कर्ज़ को हिस्सेदारी में बदलने की भारी-भरकम रकम, कंपनी पर मौजूद भारी कर्ज़ के बोझ का एक स्पष्ट संकेत है। मौजूदा शेयरधारकों के लिए सबसे बड़ा झटका उनकी हिस्सेदारी में भारी कमी (Dilution) होगी। प्रमोटरों की हिस्सेदारी मौजूदा 24.95% से घटकर महज़ 13.33% रह जाने का अनुमान है।
यह पुनर्रचना यह भी दर्शाती है कि बैंक और अन्य लोन देने वाले अब क्रेडिटर (कर्ज़ देने वाले) से कंपनी के बड़े शेयरधारक बन जाएंगे। उनका यह बड़ा मालिकाना हक़ भविष्य की रणनीतिक फैसलों को प्रभावित कर सकता है।
अतीत का सफर
Bajaj Hindusthan Sugar ने अतीत में भी कई वित्तीय मुश्किलों का सामना किया है। कंपनी को RBI की S4A योजना के तहत 2017 में लोन रीस्ट्रक्चरिंग से गुज़रना पड़ा था। इसके बाद 2022 में SBI द्वारा दिवालियापन की याचिका दायर की गई थी, जिसे बकाया चुकाने के बाद खारिज कर दिया गया। इतना ही नहीं, कंपनी को जुलाई 2022 में SEBI द्वारा डिस्टिलरी बंद होने और जुर्माने से जुड़ी जानकारी देने में लापरवाही के लिए ₹10 लाख का जुर्माना भी भरना पड़ा था, जो अतीत में गवर्नेंस की कुछ कमज़ोरियों को दिखाता है।
आगे का रास्ता
कंपनी का भविष्य अब इस कर्ज़ रीस्ट्रक्चरिंग योजना की सफल मंज़ूरी और अमल पर बहुत ज़्यादा निर्भर करता है। यह पहल कंपनी की वित्तीय स्थिति को मज़बूत करने, नकदी की स्थिति को सुधारने और एक ज़्यादा टिकाऊ Capital Structure (शेयरों की पूंजी की संरचना) बनाने की दिशा में एक अहम कदम है। Bajaj Hindusthan Sugar की लंबी अवधि की व्यवहार्यता इस पूरी वित्तीय पुनर्संरचना की प्रभावशीलता पर टिकी हुई है।