BRICS देशों ने नई दिल्ली समिट में एक स्वतंत्र 'BRICS ग्रेन एक्सचेंज' बनाने की आधिकारिक मंजूरी दे दी है। इस कदम का मकसद पश्चिमी देशों के मार्केट बेंचमार्क्स को चुनौती देना और विकासशील देशों के लिए फूड ट्रेड को स्टेबल बनाना है।
नया ग्रेन एक्सचेंज: एक बड़ी कूटनीतिक पहल
12 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में हुई समिट के दौरान BRICS देशों ने एक डिजिटल ग्रेन एक्सचेंज बनाने पर औपचारिक सहमति जताई है। रूस द्वारा इस पहल को मजबूती से आगे बढ़ाया जा रहा है। इसका मुख्य लक्ष्य एक ऐसा स्वतंत्र ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म खड़ा करना है, जो अमेरिका स्थित CME Group जैसे पश्चिमी मार्केट बेंचमार्क का विकल्प बन सके।
क्या है मास्टर प्लान?
BRICS के 11 सदस्य देश, जिनका वैश्विक GDP और एग्रीकल्चरल आउटपुट में बड़ा हिस्सा है, अब अपनी फूड सप्लाई पर अधिक संप्रभुता (Sovereignty) चाहते हैं। इस प्लेटफॉर्म के जरिए डॉलर-आधारित प्राइसिंग पर निर्भरता कम करने और स्थानीय मुद्राओं (National Currencies) में ट्रेड को बढ़ावा देने की योजना है। इसके अलावा, समिट में BRICS AGRIN (एग्रो-इनपुट्स, जेनेटिक रिसोर्सेज और इंफॉर्मेशन नेटवर्क) की स्थापना का भी ऐलान किया गया है, जो बीज तकनीक और क्लाइमेट रेजिलिएंस जैसे मुद्दों पर काम करेगा।
राह में चुनौतियां और जोखिम
भले ही यह एक बड़ा कूटनीतिक कदम है, लेकिन मार्केट एक्सपर्ट्स इसे लेकर सतर्क हैं। सबसे बड़ी चुनौती CME Group और Intercontinental Exchange (ICE) जैसे स्थापित दिग्गजों के सामने पर्याप्त लिक्विडिटी (Liquidity) और ट्रेडिंग वॉल्यूम जुटाना है। इन ग्लोबल एक्सचेंजों पर दुनिया भर के ट्रेडर्स और हेजर्स का भरोसा दशकों से बना हुआ है।
निवेशकों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि यह प्रोजेक्ट अभी अपनी शुरुआती अवस्था में है। इसके सफल होने के लिए 11 देशों के बीच तकनीकी और नियामक (Regulatory) सामंजस्य बिठाना एक लंबी प्रक्रिया होगी। फिलहाल, बाजार की नजरें इसके टेक्निकल फ्रेमवर्क, सेटलमेंट मैकेनिज्म और पायलट प्रोजेक्ट की समयसीमा पर टिकी हैं।
