आंध्र प्रदेश का फिशिंग सेक्टर गहरे संकट में है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ती लागत के कारण **70%** मछली पकड़ने वाली नावें समुद्र में नहीं उतर पा रही हैं, जिससे मार्केट में सप्लाई की किल्लत बढ़ गई है और आम लोगों के लिए सीफूड महंगा हो गया है।
आंध्र प्रदेश का मत्स्य उद्योग (Fishing Industry) इस समय एक बड़े स्ट्रक्चरल चैलेंज से गुजर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 70% मशीनीकृत नौकाएं इस समय तट पर खड़ी हैं। इसका सीधा असर सप्लाई चेन पर पड़ रहा है, जिससे कीमतों में भारी अस्थिरता देखी जा रही है।
संकट की जड़: क्या बदल रहा है समुद्र में?
बंगाल की खाड़ी में बढ़ते तापमान के कारण मछलियों के माइग्रेशन पैटर्न में बड़ा बदलाव आया है। मछलियां ठंडे पानी की तलाश में गहरे समुद्र की ओर जा रही हैं, जिससे मछुआरों को अपनी नावों को तट से काफी दूर ले जाना पड़ रहा है। ईंधन की बढ़ती कीमतों के बीच यह सफर छोटा नहीं, बल्कि महंगा और जोखिम भरा हो गया है, जिसे झेलना छोटे ऑपरेटरों के लिए नामुमकिन सा हो गया है।
कर्ज का जाल और आर्थिक दबाव
मछुआरों की माली हालत काफी खराब है। हर बोट पर औसतन ₹6 लाख से ₹10 लाख तक का कर्ज चढ़ा हुआ है। पहले जो बिजनेस मॉडल कम दूरी के शिकार पर टिका था, वह अब कर्ज की किस्तें और ईंधन का खर्च निकालने में असमर्थ है। कमाई कम और खर्चा ज्यादा होने के कारण मालिकों ने नावों को समुद्र में उतारने से ही परहेज करना शुरू कर दिया है।
फूड सप्लाई पर असर
इस संकट का असर केवल रिटेल मार्केट तक सीमित नहीं है। तटीय इलाकों में प्रदूषण और ऑक्सीजन की कमी वाले 'डेड जोन' के कारण मछलियों की उपलब्धता और भी कम हो गई है। हैरानी की बात यह है कि जो थोड़ी-बहुत सप्लाई हो भी रही है, उसे मानवीय उपभोग (Human consumption) के बजाय एक्वाकल्चर फीड के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे रिटेल मार्केट में ताजा मछली की भारी किल्लत है और कीमतें लगातार ऊपर बनी हुई हैं।
आने वाले समय में, कमोडिटी और फूड इन्फ्लेशन पर नजर रखने वाले निवेशकों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि यह संकट कितनी जल्दी खत्म होता है, क्योंकि सरकार की तटीय नीतियों और फिशिंग एक्टिविटी की रिकवरी ही तय करेगी कि सीफूड के दाम कब स्थिर होंगे।
