एल्युमिनियम सेकेंडरी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ASMA) ने सरकार से प्राइमरी एल्युमिनियम और स्क्रैप पर इंपोर्ट ड्यूटी हटाने की गुहार लगाई है। इस कदम से उन छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) को राहत मिलेगी, जो फिलहाल बढ़ी हुई इनपुट कॉस्ट और कम क्षमता के इस्तेमाल से जूझ रहे हैं।
क्या है मामला?
एल्युमिनियम सेकेंडरी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ASMA) ने केंद्र सरकार से प्राइमरी एल्युमिनियम और एल्युमिनियम स्क्रैप पर बेसिक कस्टम ड्यूटी (Basic Customs Duty) खत्म करने की मांग की है। फिलहाल, प्राइमरी एल्युमिनियम के इंपोर्ट पर 7.5% और स्क्रैप पर 2.5% ड्यूटी लगती है। ASMA का कहना है कि इस ड्यूटी और घरेलू कंपनियों की प्राइसिंग पॉलिसी के चलते देश के डाउनस्ट्रीम मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, जिसमें कई छोटे और मध्यम उद्योग (MSMEs) आते हैं, के लिए कच्चे माल की लागत बहुत बढ़ गई है।
डाउनस्ट्रीम प्लेयर्स पर लागत का बोझ
एल्युमिनियम को फिनिश गुड्स में बदलने वाली कंपनियों के लिए, कच्चे माल की लागत उनके कुल प्रोडक्शन खर्च का 80% तक हो सकती है। ASMA के पदाधिकारियों ने बताया है कि घरेलू प्राइमरी एल्युमिनियम प्रोड्यूसर्स अक्सर इंपोर्ट कॉस्ट (जिसमें ड्यूटी भी शामिल है) के हिसाब से ही अपनी कीमतें तय करते हैं। इससे डोमेस्टिक कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और डाउनस्ट्रीम मैन्युफैक्चरर्स को ग्लोबल मार्केट के मुकाबले कोई खास फायदा नहीं मिल पाता। ड्यूटी खत्म होने से खरीद की लागत कम होगी और भारतीय मैन्युफैक्चरर्स ग्लोबल प्लेयर्स से बेहतर मुकाबला कर पाएंगे।
क्षमता उपयोग पर असर
भारत प्राइमरी एल्युमिनियम का एक बड़ा उत्पादक है, लेकिन जो डाउनस्ट्रीम सेक्टर इस कच्चे मेटल को तारों, फॉयल, ऑटो पार्ट्स और अन्य वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स में बदलता है, वह अपनी स्थापित क्षमता का केवल 50-55% ही इस्तेमाल कर पा रहा है। इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों का कहना है कि महंगे कच्चे माल की वजह से यह क्षमता बेकार पड़ी है। उनका मानना है कि अगर कच्चा माल सस्ता और आसानी से उपलब्ध होगा, तो डाउनस्ट्रीम कंपनियां अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा सकती हैं, मुनाफा सुधार सकती हैं और ज़्यादा रोजगार पैदा कर सकती हैं।
क्या है मुश्किल?
इंपोर्ट ड्यूटी कम करने के किसी भी कदम का घरेलू प्राइमरी एल्युमिनियम प्रोड्यूसर्स विरोध करते हैं। उनका तर्क है कि यह ड्यूटी स्थानीय माइनिंग और स्मेल्टिंग इंडस्ट्री को सस्ते इंपोर्ट से बचाने के लिए जरूरी है। सरकार को प्राइमरी मेटल प्रोड्यूसर्स (जो भारी निवेश करते हैं) और डाउनस्ट्रीम मैन्युफैक्चरर्स (जो वैल्यू एडिशन पर ध्यान देते हैं) की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना होगा। पहले भी सरकार ने कमोडिटी की ग्लोबल कीमतों और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की सेहत को ध्यान में रखकर ही ऐसे फैसले लिए हैं।
इन्वेस्टर्स को क्या देखना चाहिए?
मेटल पर निर्भर सेक्टर जैसे ऑटोमोटिव, कंस्ट्रक्शन और इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट के इन्वेस्टर्स को इस पॉलिसी के आगे बढ़ने की प्रक्रिया पर नजर रखनी चाहिए। अगर सरकार ड्यूटी कम या खत्म करने का फैसला करती है, तो डाउनस्ट्रीम कंपनियों की इनपुट कॉस्ट कम होने से उनके मार्जिन को फायदा हो सकता है। वहीं, अगर ड्यूटी बनी रहती है या बढ़ाई जाती है, तो इन प्रोसेसिंग कंपनियों पर मार्जिन का दबाव बना रहेगा। कस्टम ड्यूटी में बदलाव की सरकारी सूचनाओं और प्रमुख घरेलू प्राइमरी एल्युमिनियम प्रोड्यूसर्स की प्रतिक्रियाओं पर नज़र रखना अहम होगा।
