अफ्रीका से आने वाली अरहर दाल (Pigeonpea) की कीमतों में **10%** से ज्यादा का उछाल आया है। कम प्रोडक्शन के अनुमान और घरेलू फसल में अनिश्चितता के चलते आयात महंगा हो गया है, जिससे खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
सप्लाई चेन पर संकट
बीते कुछ हफ्तों में अफ्रीकी अरहर दाल की कीमतों में ₹10 प्रति किलो की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस तेजी के पीछे मुख्य वजह मोजाम्बिक और तंजानिया जैसे बड़े एक्सपोर्ट हब से आ रही कम पैदावार की खबरें हैं। चूंकि भारत दुनिया में दाल का सबसे बड़ा कंज्यूमर है, इसलिए विदेशी बाजारों में सप्लाई की कोई भी कमी सीधे घरेलू मार्केट को प्रभावित करती है।
घरेलू मोर्चे पर चुनौतियां
भारत में खरीफ सीजन के दौरान बुवाई का रकबा तो बढ़ा है, लेकिन पैदावार का आउटलुक अभी भी अनिश्चित है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे मुख्य उत्पादक राज्यों में मौसम की मार ने उम्मीदों को कम कर दिया है। हालांकि उत्तर प्रदेश में बुवाई बढ़ी है, लेकिन मार्केट की नजरें अगली फसल पर टिकी हैं, जिसमें अभी 10 हफ्ते का समय है।
बढ़ती इंपोर्ट कॉस्ट
विदेशी बाजारों से दाल मंगाना भी महंगा साबित हो रहा है। अक्टूबर-नवंबर शिपमेंट के लिए मोजाम्बिक गजनी अरहर की कीमत लगभग $825 प्रति टन तक पहुंच गई है। इन ऊंचे अंतरराष्ट्रीय दामों की वजह से आयात से मार्केट को वह राहत नहीं मिल पा रही है, जिसकी उम्मीद की जा रही थी।
सरकार की क्या होगी रणनीति?
मार्केट की नजरें अब दो मुख्य बातों पर हैं: दिवाली की मांग और सरकारी दखल। अगर सप्लाई-डिमांड का गैप ज्यादा बढ़ता है, तो सरकार अपने बफर स्टॉक (Buffer Stock) से दाल रिलीज करने का फैसला ले सकती है। वहीं, निवेशकों के लिए चिंता का विषय यह है कि रॉ मटेरियल की बढ़ती लागत का सीधा असर फूड प्रोसेसिंग और स्नैक मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ सकता है।
