Adani Group और अबू धाबी की IHC कंपनी ने मिलकर ओडिशा में एक बड़ा एल्युमीनियम स्मेल्टर कॉम्प्लेक्स बनाने का ऐलान किया है। इस प्रोजेक्ट पर कुल $11.5 अरब का निवेश होगा। इस कदम से भारत का एल्युमीनियम प्रोडक्शन 20 लाख टन तक बढ़ेगा और Hindalco और Vedanta जैसी कंपनियों को सीधी टक्कर मिलेगी।
क्या हुआ?
Adani Group ने आधिकारिक तौर पर एल्युमीनियम सेक्टर में कदम रख दिया है। इसके लिए कंपनी ने अबू धाबी की इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी (IHC) के साथ साझेदारी की है। इस वेंचर के तहत ओडिशा में एक विशाल एल्युमीनियम प्रोडक्शन कॉम्प्लेक्स बनाया जाएगा, जिस पर करीब $11.5 अरब (लगभग ₹96,000 करोड़) का भारी-भरकम निवेश किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट की सालाना 20 लाख टन एल्युमीनियम उत्पादन क्षमता होगी, जिससे भारत का कुल उत्पादन काफी बढ़ जाएगा। इस कॉम्प्लेक्स में एक एल्यूमिना रिफाइनरी, एक कैप्टिव पावर प्लांट और एक डाउनस्ट्रीम एल्युमीनियम पार्क भी शामिल होगा। उम्मीद है कि यह प्रोजेक्ट अगले पांच सालों में फेज वाइज पूरा हो जाएगा।
बिजनेस स्ट्रेटेजी और फंडिंग
इस प्रोजेक्ट की फंडिंग का ढांचा 70% डेट (Debt) और 30% इक्विटी (Equity) का होगा। इसमें Adani Enterprises और IHC की सब्सिडियरी इंटरनेशनल रिसोर्सेज होल्डिंग के बीच निवेश बराबर-बराबर बंटेगा। कंपनी एल्युमीनियम स्मेल्टिंग में लगने वाली ज्यादा एनर्जी की जरूरत को पूरा करने के लिए कम लागत वाले कैप्टिव पावर का फायदा उठाने की योजना बना रही है। ओडिशा को चुनने की एक बड़ी वजह यह है कि राज्य में भारत के बॉक्साइट रिजर्व का एक बड़ा हिस्सा है, जो एल्युमीनियम बनाने का कच्चा माल है। रिफाइनरी रायगढ़ा में और स्मेल्टर सुंदरगढ़ क्षेत्र में स्थापित किया जाएगा, जो कुल मिलाकर 7,000 एकड़ से ज्यादा का इलाका कवर करेगा।
कॉम्पिटिशन और मार्केट का हाल
फिलहाल, घरेलू बाजार में Hindalco Industries और Vedanta Aluminium का दबदबा है, जो करीब 90% मार्केट पर कब्जा रखते हैं। हालांकि भारत एल्युमीनियम का एक बड़ा वैश्विक उत्पादक है, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की बढ़ती मांग के चलते देश अभी भी नेट इंपोर्टर है। मौजूदा खिलाड़ियों के पास भी अपनी क्षमता विस्तार की योजनाएं चल रही हैं। एक नए और बड़े खिलाड़ी के आने से मुकाबला और कड़ा हो सकता है। हालांकि, कंपनी का मैनेजमेंट का कहना है कि इस दशक के अंत तक डोमेस्टिक डिमांड में कम से कम 50% की बढ़ोतरी की उम्मीद है, जिससे कई खिलाड़ियों के लिए जगह बन सकती है।
एग्जीक्यूशन, डेट और कच्चे माल के रिस्क
निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह एक कैपिटल-इंटेंसिव प्रोजेक्ट है जिसकी एग्जीक्यूशन टाइमलाइन कई साल लंबी है। इस स्केल के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अक्सर जमीन अधिग्रहण, पर्यावरण क्लीयरेंस और लागत बढ़ने जैसे रिस्क जुड़े होते हैं। इसके अलावा, कंपनी फंडिंग के लिए 70% डेट पर निर्भर रहेगी, जिससे ग्रुप का कुल डेट लोड बढ़ेगा। प्रोजेक्ट की लॉन्ग-टर्म वायबिलिटी इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनी बॉक्साइट की सप्लाई को सुरक्षित कर पाती है या नहीं और ग्लोबल एल्युमीनियम कीमतों की अस्थिरता को कितनी कुशलता से मैनेज कर पाती है, जो इंटरनेशनल कमोडिटी मार्केट्स से जुड़ी हैं।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
आगे चलकर, निवेशकों को जमीन अधिग्रहण और पर्यावरण परमिट की प्रगति पर नजर रखनी होगी, जो समय पर प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। निवेशक ग्रुप के ओवरऑल बैलेंस शीट और क्रेडिट प्रोफाइल पर बढ़े हुए डेट लेवल के असर को भी ट्रैक करेंगे। इसके अलावा, बॉक्साइट माइनिंग राइट्स की खरीद और एक्चुअल कमीशनिंग टाइमलाइन से जुड़े कोई भी अपडेट, प्रोजेक्ट के लॉन्ग-टर्म अर्निंग्स में योगदान का आकलन करने के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
