West Asia में जारी तनाव और संघर्ष के कारण समुद्री रास्तों पर खतरा बढ़ गया है, खासकर 'होरमुज़ जलडमरूमध्य' के पास। इससे क्रूड ऑयल की कीमतों में आग लग गई है। इस बढ़त का सीधा असर उन उद्योगों पर पड़ रहा है जो पेट्रोकेमिकल्स पर निर्भर हैं, जैसे प्लास्टिक और टेक्सटाइल। इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि पिछले एक महीने में ही पॉलिमर की कीमतें 65% तक उछल गई हैं।
सिंथेटिक टेक्सटाइल के लिए ज़रूरी कच्चे माल, जैसे PTA और MEG, की कीमतें भी आसमान छू रही हैं और ये आसानी से मिल भी नहीं पा रहे।
प्लास्टिक बनाने वाले निर्माताओं के लिए कच्चे माल की लागत 60-70% तक बढ़ गई है। इस वजह से उन्हें अपने प्रोडक्शन में 50% तक की कटौती करनी पड़ी है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे बढ़ी हुई लागत को अंतिम उत्पाद की कीमतों में पूरी तरह से नहीं जोड़ पा रहे। प्लास्टिक उत्पादों की कीमतें मुश्किल से 25% ही बढ़ाई जा सकी हैं, जिससे उनके प्रॉफिट मार्जिन पर भारी दबाव है।
टेक्सटाइल सेक्टर भी इससे अछूता नहीं है। धागों (Threads) की कीमतें 10% महंगी हो गई हैं, जबकि कपड़ों की रंगाई (Dyeing) का खर्च 40-50% तक बढ़ गया है।
सामान की ढुलाई (Shipping) का खर्च भी बेतहाशा बढ़ गया है। फ्रेट रेट्स और कंटेनर की लागतें बढ़ गई हैं, वहीं समुद्री रास्तों पर बढ़े खतरे के कारण मरीन इंश्योरेंस प्रीमियम में भी उछाल आया है। इन सभी वजहों से कंपनियों का ऑपरेटिंग खर्च बढ़ रहा है, डिलीवरी का समय 60 दिनों तक पहुँच गया है, और नए ऑर्डर्स को लेकर अनिश्चितता छा गई है।
यह संकट बड़े पैमाने पर भी देखा जा रहा है। भारत की मैन्युफैक्चरिंग एक्टिविटी, जिसे 'HSBC मैन्युफैक्चरिंग PMI' से मापा जाता है, मार्च 2026 में घटकर 53.9 पर आ गई, जो लगभग चार साल का सबसे निचला स्तर है। यह व्यापक बाजार दबाव और अनिश्चितता का संकेत देता है। हालांकि, Reliance Industries (RIL) और Indian Oil Corporation (IOCL) जैसी बड़ी और इंटीग्रेटेड कंपनियों की स्थिति बेहतर है। RIL अपने बड़े ऑयल-टू-केमिकल्स बिजनेस और रिफाइनिंग क्षमता के कारण फायदे में है, जबकि IOCL अपनी फैसिलिटीज का विस्तार कर रहा है। लेकिन Vapi जैसे औद्योगिक हब में छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) के पास ऐसी झटकों को झेलने की क्षमता नहीं है।
ये छोटे उद्योग अक्सर बहुत कम मुनाफे पर काम करते हैं, जो उन्हें कीमतों के उतार-चढ़ाव और सप्लाई की दिक्कतों के प्रति बेहद संवेदनशील बनाता है। कई MSMEs को प्रोडक्शन रोकना पड़ा है, जिससे उनके अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। यह वित्तीय दबाव इन कंपनियों के 50% तक एक्सपोर्ट एक्टिविटीज़ को भी बाधित कर रहा है।
इस वित्तीय दबाव ने कर्मचारियों के बीच भी चिंता बढ़ा दी है। कमर्शियल एलपीजी (LPG) की सप्लाई में भारी कमी देखी जा रही है, जिससे पेंडेमिक जैसे लॉकडाउन की आशंकाएं बढ़ने लगी हैं। यह प्रवासी मजदूरों के लिए खास तौर पर चिंताजनक है। इस अनिश्चितता के कारण वर्कर अपनी नौकरी छोड़ सकते हैं, जिससे प्रोडक्शन और कैश फ्लो की समस्याएँ और बढ़ जाएंगी।
यह भू-राजनीतिक संकट भारत के MSME सेक्टर की अंदरूनी कमजोरियों को उजागर करता है। बड़ी कंपनियों के विपरीत, जिनके पास पर्याप्त कैश और आय के कई स्रोत होते हैं, ये छोटे व्यवसाय बेहद कमजोर हैं। वे सप्लायर्स और ग्राहकों से मोलभाव करने में भी कमज़ोर होते हैं, जिससे वे आसानी से प्रभावित हो जाते हैं। इंपोर्टेड पेट्रोकेमिकल्स पर निर्भरता और ऊंची ग्लोबल शिपिंग लागतें उनके लिए मुश्किल खड़ी कर रही हैं। अगर समय पर वित्तीय मदद, कच्चे माल की कीमतों को स्थिर करने के उपाय या टैक्स में छूट जैसे कदम नहीं उठाए गए, तो प्लास्टिक और टेक्सटाइल सेक्टर के कई MSMEs हमेशा के लिए बंद हो सकते हैं।
हालांकि, भारत के पेट्रोकेमिकल और टेक्सटाइल उद्योगों का लॉन्ग-टर्म ग्रोथ आउटलुक मजबूत है, खासकर डोमेस्टिक डिमांड और सरकारी स्कीम्स (जैसे PLI स्कीम) के बूते। पेट्रोकेमिकल मार्केट 2034 तक $84.40 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, वहीं टेक्सटाइल इंडस्ट्री 2030 तक $350 बिलियन तक पहुंच सकती है। लेकिन इस ग्रोथ के लिए वर्तमान सप्लाई चेन की रुकावटों को दूर करना और छोटे उद्योगों के लिए एक स्थिर कारोबारी माहौल बनाना ज़रूरी है।