India ACC Battery Market: 2030 तक 700 GWh पहुंचेगी मांग, EV और रिन्यूएबल एनर्जी की भारी ज़रूरत!

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AuthorMehul Desai|Published at:
India ACC Battery Market: 2030 तक 700 GWh पहुंचेगी मांग, EV और रिन्यूएबल एनर्जी की भारी ज़रूरत!

भारत का एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) मार्केट 2030 तक सालाना **39%** की रफ़्तार से बढ़ने वाला है। इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बढ़ती मांग और रिन्यूएबल एनर्जी स्टोरेज की ज़रूरत इस ग्रोथ को बढ़ावा दे रही है। यह बदलाव देश को इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने के लिए बैटरी केमिकल के डोमेस्टिक प्रोडक्शन की ओर ले जा रहा है। निवेशक इस लॉन्ग-टर्म ग्रोथ को पूरा करने के लिए लोकल मटेरियल सप्लायर्स की कैपेसिटी पर नज़र रख रहे हैं।

Detailed Coverage

भारत में बैटरी इकोसिस्टम का उभार

भारत अब बैटरी रॉ मैटेरियल्स के नेट इंपोर्टर से एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) के लिए एक डोमेस्टिक इकोसिस्टम बनाने की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, 2025 से 2030 के बीच इन सेल्स की डिमांड सालाना 39% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ सकती है, जो कुल 700 GWh तक पहुँच सकती है। इस ग्रोथ को इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सेक्टर के विस्तार और बड़े पैमाने पर एनर्जी स्टोरेज सॉल्यूशंस की बढ़ती ज़रूरत से सपोर्ट मिल रहा है।

एनर्जी स्टोरेज: ग्रोथ का बड़ा फैक्टर

जहां बैटरी डिमांड का एक बड़ा फोकस इलेक्ट्रिक वाहनों पर है, वहीं बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) भी इस ग्रोथ में एक बड़ा योगदानकर्ता बनकर उभर रहा है। अनुमान बताते हैं कि भारत के रिन्यूएबल एनर्जी आउटपुट को मैनेज करने के लिए ज़रूरी एनर्जी स्टोरेज की डिमांड 2030 तक सालाना 78% की दर से बढ़ सकती है। इस मांग से एक मजबूत सप्लाई चेन की ज़रूरत पैदा हो गई है, जिसमें लिथियम आयरन फॉस्फेट, ग्रेफाइट और विभिन्न इलेक्ट्रोलाइट मैटेरियल्स जैसे ज़रूरी बैटरी केमिकल्स शामिल हैं।

सरकारी इंसेंटिव और डोमेस्टिक कैपेसिटी

सरकार की ₹18,100 करोड़ की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम लोकल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने में एक अहम भूमिका निभा रही है। इस पॉलिसी का लक्ष्य 50 GWh की डेडिकेटेड डोमेस्टिक सेल कैपेसिटी बनाना है। फिलहाल, इंडस्ट्री ने 10 से ज़्यादा मैन्युफैक्चरर्स से 178 GWh प्रोडक्शन कैपेसिटी के टारगेट के साथ अनाउंसमेंट्स देखे हैं। साथ ही, नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन लिथियम और निकेल जैसे मिनरल्स की लोकल एक्सप्लोरेशन और प्रोसेसिंग को बेहतर बनाने के लिए काम कर रहा है। ये प्रयास महंगे इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने और एक सेल्फ-सस्टेनिंग वैल्यू चेन बनाने की बड़ी स्ट्रेटेजी का हिस्सा हैं।

जोखिम और भविष्य की निगरानी

स्पष्ट ग्रोथ के अवसरों के बावजूद, निवेशकों को कई प्रैक्टिकल चुनौतियों पर नज़र रखनी चाहिए जो प्रॉफिटेबिलिटी और एग्जीक्यूशन को प्रभावित कर सकती हैं। यह सेक्टर वर्तमान में कैथोड और एनोड प्रोडक्शन के लिए इंपोर्टेड रॉ मैटेरियल्स पर बहुत ज़्यादा निर्भर है, जिससे मैन्युफैक्चरर्स ग्लोबल प्राइस वोलेटिलिटी और सप्लाई चेन में रुकावटों के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं। इसके अलावा, जहां लिथियम आयरन फॉस्फेट केमिस्ट्री की ओर बढ़ना अभी सुरक्षा और लागत के मामले में पसंदीदा है, वहीं सोडियम-आयन या सॉलिड-स्टेट बैटरीज में टेक्नोलॉजिकल एडवांस्डमेंट्स अगले दशक में मटेरियल की ज़रूरतें बदल सकती हैं। डोमेस्टिक प्लेयर्स की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि वे असेंबली से आगे बढ़कर हाई-वैल्यू केमिकल कंपोनेंट्स को लोकल लेवल पर सफलतापूर्वक मैन्युफैक्चर करने में कितने सक्षम हैं। इंडस्ट्री के लिए अगला महत्वपूर्ण मॉनिटर करने वाला पॉइंट अनाउंस की गई 178 GWh कैपेसिटी की एक्चुअल कमीशनिंग टाइमलाइन और यह देखना होगा कि डोमेस्टिक प्लेयर्स क्रिटिकल मिनरल्स के लिए कितनी स्थिर सप्लाई चेन सुरक्षित कर पाते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.