भारतीय केमिकल कंपनियों के लिए बुरी खबर! पहली तिमाही में हुई शानदार कमाई के बाद, अब दूसरी तिमाही में मुनाफे पर दबाव देखने को मिल सकता है। इसकी वजह है सस्ते रॉ मैटेरियल का स्टॉक खत्म होना और बढ़ती लागत।
क्यों घटने की उम्मीद है मुनाफा?
कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय केमिकल मैन्युफैक्चरर्स के लिए मुनाफा मार्जिन (Profit Margin) पर दबाव का दौर शुरू हो सकता है। भले ही इस फाइनेंशियल ईयर की पहली तिमाही (Q1) में कई कंपनियों ने दमदार नतीजे पेश किए थे, लेकिन अब हालात बदलने वाले हैं।
Q1 में क्या था खास?
पहली तिमाही में, कई बड़े केमिकल प्रोड्यूसर्स ने पिछले साल की तुलना में 17% ज्यादा सेल्स और 22% ज्यादा ऑपरेशनल प्रॉफिट दर्ज किया था। Aarti Industries, Deepak Nitrite, Jubilant Ingrevia और SRF जैसी कंपनियों को इसका सीधा फायदा मिला। दरअसल, ये कंपनियाँ सस्ते दामों पर खरीदे गए रॉ मैटेरियल का इस्तेमाल कर पा रही थीं, जबकि ग्लोबल सप्लाई चेन में आई दिक्कतों और मिडिल ईस्ट के टेंशन के कारण वे अपने तैयार प्रोडक्ट्स को ऊँचे दामों पर बेच पा रही थीं।
अब क्या बदल रहा है?
यह फायदा अब खत्म हो रहा है। सस्ता रॉ मैटेरियल का स्टॉक लगभग खत्म हो चुका है और अब कंपनियों को मौजूदा ऊँचे ग्लोबल दामों पर इनपुट्स खरीदने पड़ रहे हैं। इस लागत वृद्धि (Cost Structure) का असर दूसरी तिमाही (Q2) के मुनाफे पर साफ दिखेगा। एनालिस्ट्स का कहना है कि फिनोल जैसे कुछ चुनिंदा प्रोडक्ट्स को छोड़कर, जहाँ सप्लाई चेन की समस्या बनी हुई है, ज्यादातर सेक्टर सामान्य ऑपरेशनल कंडीशन में लौट रहे हैं।
डिमांड और भविष्य का अनुमान
इसके अलावा, सेक्टर को ग्राहक डिमांड (Customer Demand) को लेकर भी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ग्लोबल इकोनॉमिक अनिश्चितता और प्रोडक्ट की ऊँची कीमतें कुछ कंपनियों के लिए डिमांड बनाए रखना मुश्किल बना रही हैं। CRISIL रेटिंग्स का अनुमान है कि स्पेशियलिटी केमिकल रेवेन्यू ग्रोथ इस पूरे फाइनेंशियल ईयर के लिए घटकर 6-7% रह सकती है, और प्रॉफिट मार्जिन 14% से 14.5% के बीच स्थिर हो सकते हैं। यह दिखाता है कि कंपनियाँ बढ़ती लागत और उसे ग्राहकों पर डालने की अपनी क्षमता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं।
एग्रोकेमिकल सेक्टर में थोड़ी राहत?
एग्रोकेमिकल सेगमेंट के लिए थोड़ी पॉजिटिव खबर है, जिसे दूसरी तिमाही में कुछ सहारा मिल सकता है। इसकी वजह है खरीफ की बुवाई में देरी और पिछले साल के मुकाबले बेहतर बेसलाइन। हालांकि, इंडस्ट्री को अपने कर्ज (Debt) और कैश फ्लो (Cash Flow) के बीच संतुलन बनाए रखने पर ध्यान देना होगा। कैपेसिटी बढ़ाने वाले प्रोजेक्ट्स के लिए लोन पर ज्यादा निर्भरता एक रिस्क भी पैदा कर सकती है, अगर कमाई उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ी तो।
