भारत सरकार ने घरेलू उत्पादकों को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए S-PVC रेजिन के आयात पर न्यूनतम मूल्य (Minimum Import Price) की सीमा तय कर दी है। अब से **$0.766 प्रति किलो** से कम कीमत पर S-PVC रेजिन का आयात नहीं किया जा सकेगा। इस कदम से Reliance Industries और Adani Group जैसी बड़ी कंपनियों को फायदा होने की उम्मीद है, जो अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा रही हैं।
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आयात पर लगी लगाम: DGFT का बड़ा ऐलान
डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) ने सस्पेंशन ग्रेड पॉलीविनाइल क्लोराइड (S-PVC) रेजिन के आयात के लिए $0.766 प्रति किलोग्राम का न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) तय किया है, जो 24 जुलाई 2026 से लागू होगा। इस नियम के तहत, इस न्यूनतम सीमा से कम कीमत वाले S-PVC रेजिन के आयात को 'फ्री' से बदलकर 'प्रतिबंधित' श्रेणी में डाल दिया गया है। यह फैसला उन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है जो पाइप, केबल और अन्य प्लास्टिक उत्पाद बनाने के लिए इस कच्चे माल पर निर्भर हैं, क्योंकि इससे घरेलू उत्पादन की लागत पर सीधा असर पड़ेगा।
क्यों उठाया ये कदम?
भारत सालाना करीब 47 लाख मीट्रिक टन (MMT) PVC रेजिन की खपत करता है, जिसमें से 96% S-PVC की मांग है। हालांकि, देश की अपनी उत्पादन क्षमता सिर्फ 17 लाख मीट्रिक टन के आसपास है, जिसके चलते लगभग 30 लाख मीट्रिक टन का आयात करना पड़ता है। पिछले फाइनेंशियल ईयर में भारत ने $1.63 बिलियन मूल्य का S-PVC रेजिन विदेशों से आयात किया था। सरकार का लक्ष्य इस न्यूनतम मूल्य सीमा से घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना और आयात पर निर्भरता घटाना है।
घरेलू उत्पादन में तेजी
आयात पर निर्भरता को कम करने के लिए, देश में उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर बड़ा निवेश किया जा रहा है। Reliance Industries एथिलीन रूट के जरिए अपनी क्षमता का विस्तार कर रही है। वहीं, Adani Group गुजरात के मुंद्रा में 20 लाख मीट्रिक टन का एक इंटीग्रेटेड PVC कॉम्प्लेक्स तैयार कर रहा है। कोयले से केमिकल बनाने की प्रक्रिया का उपयोग करते हुए, इस प्रोजेक्ट का पहला फेज फाइनेंशियल ईयर 2027-28 तक 10 लाख मीट्रिक टन नई क्षमता जोड़ने की उम्मीद है।
अंतर्राष्ट्रीय बाजारों पर असर
हालांकि, नई नीति का तत्काल असर उन अंतर्राष्ट्रीय सप्लायर्स पर पड़ेगा जो पहले कम कीमतों पर माल बेचते थे। चीन, जापान, ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे देश, जो भारत को S-PVC रेजिन के प्रमुख सप्लायर हैं, आमतौर पर $0.65 से $0.75 प्रति किलोग्राम की दर से निर्यात करते हैं। नई $0.766 की सीमा से नीचे होने के कारण, इन देशों के निर्यातकों को या तो अपनी कीमत बढ़ानी होगी या फिर जटिल लाइसेंसिंग प्रक्रिया से गुजरना होगा। निवेशकों के लिए यह देखना अहम होगा कि घरेलू उत्पादक मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त उत्पादन बढ़ा पाते हैं या नहीं, ताकि डाउनस्ट्रीम उद्योगों के लिए लागत न बढ़े।
