JSW Group द्वारा Akzo Nobel India के पेंट्स बिज़नेस में 60% से ज़्यादा हिस्सेदारी खरीदने के सौदे के बाद, कंपनी में बड़े फेरबदल की ओर कदम बढ़ाए गए हैं। इस पूरे सौदे का मूल्य लगभग ₹2,000 से ₹2,500 करोड़ रुपये आंका जा रहा है।
शेयरधारकों की वोटिंग संपन्न
कंपनी के लिए 1 फरवरी, 2026 से शुरू हुई ई-वोटिंग प्रक्रिया 2 मार्च, 2026 को पूरी हो गई। इस दौरान शेयरधारकों ने कंपनी के नाम को JSW Dulux Limited में बदलने, और बोर्ड में नए सदस्यों की नियुक्ति जैसे अहम प्रस्तावों पर अपने मत दिए। शेयरधारकों के वोट की पात्रता तय करने के लिए 23 जनवरी, 2026 की कट-ऑफ डेट रखी गई थी।
बोर्ड में बदलाव और नया नाम
प्रस्तावित बदलावों में श्री पार्थ सज्जन जिंदल को चेयरमैन और नॉन-एग्जीक्यूटिव नॉन-इंडिपेंडेंट डायरेक्टर, श्री शांतनु महाराज खोसला को इंडिपेंडेंट डायरेक्टर के पद पर नियुक्त करना शामिल है। वहीं, श्री राजीव राजगोपाल को ज्वाइंट मैनेजिंग डायरेक्टर और चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (CEO) के पद पर प्रमोट करने का भी प्रस्ताव था। नाम बदलने के प्रस्ताव के लिए कंपनी के मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन (MoA) और आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (AoA) जैसे बुनियादी कानूनी दस्तावेजों में संशोधन की ज़रूरत पड़ेगी।
नतीजों का इंतजार, बाज़ार पर असर?
इन सभी महत्वपूर्ण फैसलों के अंतिम नतीजे स्क्रूटिनाइजर की रिपोर्ट आने के बाद ही सामने आएंगे, जिसके अगले 48 घंटों में जारी होने की उम्मीद है। यह रिपोर्ट ही बताएगी कि शेयरधारकों ने इन प्रस्तावों को मंजूरी दी है या नहीं। यह शेयरधारक वोटिंग, JSW Group के Akzo Nobel India के पेंट्स बिज़नेस में पूर्ण एकीकरण की दिशा में एक निर्णायक कदम है। कंपनी का नया नाम और नए बोर्ड की नियुक्ति, इस बड़े अधिग्रहण का सीधा परिणाम है, जिसका मकसद JSW के व्यापक कॉर्पोरेट विज़न के साथ कंपनी को संरेखित करना है।
आगे क्या?
Akzo Nobel India, जो जल्द ही JSW Dulux के तौर पर जानी जाएगी, भारतीय पेंट बाज़ार में Asian Paints Ltd और Berger Paints India Ltd जैसी दिग्गज कंपनियों से सीधी प्रतिस्पर्धा करती है। JSW Group के साथ जुड़ने से उम्मीद है कि Dulux ब्रांड की पुरानी पहचान और JSW की औद्योगिक मजबूती मिलकर बाज़ार में नई पकड़ बनाएंगे। अब सबकी निगाहें स्क्रूटिनाइजर की रिपोर्ट पर टिकी हैं। किसी भी प्रस्ताव का असफल होना, कंपनी के भविष्य की योजनाओं को प्रभावित कर सकता है। इसके अतिरिक्त, नाम बदलने और अन्य संरचनात्मक बदलावों के लिए नियामक निकायों से अंतिम मंजूरी मिलना भी ज़रूरी होगा, जिसमें अनपेक्षित देरी हो सकती है।