भारतीय शेयर बाजार में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। स्मॉल-कैप कंपनियां अब Nifty 50 के दिग्गजों के मुकाबले कहीं ज्यादा महंगे P/E रेश्यो पर ट्रेड कर रही हैं। निवेशकों का यह उत्साह भविष्य की ग्रोथ की उम्मीदों को दर्शाता है, लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसे गैप लंबे समय तक टिकते नहीं हैं।
भारतीय शेयर बाजार में वैल्यूएशन की एक नई तस्वीर उभर रही है। आमतौर पर Nifty 50 की बड़ी कंपनियां अपने स्टेबल बिजनेस मॉडल के कारण प्रीमियम पर रहती थीं, लेकिन अब बाजी पलट गई है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, Nifty Midcap 100 और Nifty Smallcap 100 इंडेक्स अब लार्ज-कैप की तुलना में बहुत ऊंचे मल्टीपल्स पर चल रहे हैं।
आंकड़ों का गणित
फिलहाल, Nifty 50 का ट्रेलिंग P/E रेश्यो 19.7 के आसपास है। इसके उलट, Nifty Midcap 100 का P/E 29.9 और Nifty Smallcap 100 का P/E 34.4 के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। P/E रेश्यो हमें बताता है कि निवेशक कंपनी के ₹1 के प्रॉफिट के लिए कितना पैसा चुकाने को तैयार हैं। यह ऊंचे नंबर्स साफ इशारा करते हैं कि बाजार स्मॉल-कैप कंपनियों से भविष्य में जबरदस्त ग्रोथ की उम्मीद लगाए बैठा है।
रिटेल निवेशकों का जोश
बाजार की इस उलटी चाल की मुख्य वजह रिटेल निवेशकों का जबरदस्त ऑप्टिमिज्म है, जो नई और ग्रोथ-ओरिएंटेड कंपनियों पर दांव लगा रहे हैं। हालांकि, इस जोश की वजह से शेयर के भाव तो बढ़ गए हैं, लेकिन यह तेजी कंपनी के मौजूदा बैलेंस शीट प्रॉफिट से मेल नहीं खाती। यानी बाजार आज के प्रदर्शन की जगह एक 'उम्मीदों भरे भविष्य' की कीमत चुका रहा है।
क्या है आगे का रिस्क?
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि 'मीन रिवर्जन' (mean reversion) का नियम यहां भी लागू हो सकता है। अगर छोटी कंपनियों की कमाई उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी, तो उनके वैल्युएशन में गिरावट आ सकती है। वहीं दूसरी ओर, अगर बाजार का ध्यान वापस वैल्यू स्टॉक्स की ओर लौटता है, तो बैंकिंग और कैपिटल गुड्स सेक्टर के लार्ज-कैप शेयरों में फिर से चमक आ सकती है। इसके अलावा, FIIs (फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स) की चाल भी अहम होगी, जो आमतौर पर लार्ज-कैप की स्थिरता और लिक्विडिटी पसंद करते हैं। फिलहाल, निवेशकों के लिए नजर इस पर होनी चाहिए कि क्या छोटी कंपनियों का प्रॉफिट उनके महंगे वैल्युएशन को जस्टिफाई कर पाएगा या नहीं।
