Suzlon Energy के Q2 के नतीजे मिले-जुले रहे हैं। जहां कंपनी का रेवेन्यू **26%** बढ़कर **₹4,900 करोड़** पहुंच गया है, वहीं EBITDA मार्जिन पिछले साल के **18.6%** से घटकर **15%** पर आ गया है।
मुनाफे पर क्यों दिख रहा है दबाव?
कंपनी की ऑपरेशनल परफॉर्मेंस काफी मजबूत दिख रही है, लेकिन प्रॉफिटेबिलिटी के मोर्चे पर चुनौती बनी हुई है। कंपनी के मुनाफे में इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह उनका बिजनेस मॉडल है। Suzlon अब पहले के मुकाबले ज्यादा EPC (इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन) प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है। हालांकि, इस बदलाव से ऑर्डर एग्जीक्यूशन और इंस्टॉलेशन वॉल्यूम में जबरदस्त तेजी आई है, जो 565MW से बढ़कर 710MW हो गया है, लेकिन EPC प्रोजेक्ट्स में मैन्युफैक्चरिंग के मुकाबले मार्जिन काफी कम होते हैं।
सेक्टर में बढ़ती प्रतिस्पर्धा
पूरे विंड एनर्जी सेक्टर में इस समय 'डिमांड-सप्लाई' का बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। इंडस्ट्री की कैपेसिटी 15GW से 20GW के बीच पहुंच रही है, जबकि भारतीय बाजार की कुल सालाना डिमांड मात्र 7GW से 8GW के आसपास है। इस ज्यादा कैपेसिटी की वजह से बाजार में प्रतिस्पर्धा (Competition) बहुत बढ़ गई है, जिसका सीधा असर कंपनियों की प्राइसिंग पावर पर पड़ता है।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
मार्केट एनालिस्ट्स अब कंपनी के भविष्य के नतीजों को लेकर थोड़े सतर्क हैं। निवेशकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या Suzlon बढ़ती लागत को कंट्रोल कर पाएगी या EPC ऑपरेशंस का मार्जिन पर असर लंबे समय तक बना रहेगा। कंपनी के ऑर्डर एग्जीक्यूशन और प्रति मेगावाट रियलाइजेशन (Realization) पर नजर रखना अब बेहद जरूरी हो गया है।
