SEBI के नए PRIM फ्रेमवर्क ने PMS में एंट्री के लिए मिनिमम इन्वेस्टमेंट लिमिट को **₹50 लाख** से घटाकर **₹25 लाख** कर दिया है। इससे रिटेल निवेशकों के लिए एक्टिव इन्वेस्टिंग का रास्ता आसान हो गया है, हालांकि एक्सपर्ट्स **15-18%** रिटर्न की उम्मीद के साथ निवेशकों को फीस और रिस्क को समझने की सलाह दे रहे हैं।
निवेश का नया द्वार
भारत में पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) का दायरा अब तेजी से बदलने वाला है। SEBI द्वारा लाए गए 'पोर्टफोलियो मैनेजर्स रूट फॉर इन्वेस्टिंग इन म्यूचुअल फंड यूनिट्स' (PRIM) फ्रेमवर्क के जरिए अब निवेशक कम पूंजी के साथ भी प्रोफेशनल पोर्टफोलियो मैनेजमेंट का लाभ ले सकेंगे। यह कदम खासकर उन निवेशकों के लिए बड़ा है जो अब तक ऊंची एंट्री लिमिट के कारण बाहर थे।
क्या है मार्केट की उम्मीदें?
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह बदलाव एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) में बड़ी उछाल लाएगा। जानकारों के मुताबिक, एक्टिव स्टॉक सिलेक्शन के जरिए 15-18% सालाना रिटर्न की उम्मीद जताई जा रही है, जिसे 'जेनरेटिंग अल्फा' कहा जाता है। हालांकि, यह याद रखना जरूरी है कि ये केवल अनुमान हैं और बाजार के उतार-चढ़ाव में परफॉर्मेंस मैनेजर की स्किल्स पर निर्भर करेगी।
सुरक्षा और फीस का गणित
निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए SEBI ने कड़े नियम तय किए हैं:
- नेट वर्थ: PRIM रूट के तहत ऑपरेट करने वाले मैनेजर्स के लिए कम से कम ₹2 करोड़ की नेट वर्थ अनिवार्य है।
- फीस कैप: फिक्स्ड मैनेजमेंट फीस को क्लाइंट के एसेट्स के 1% तक सीमित कर दिया गया है, ताकि खर्चों में पारदर्शिता रहे।
रिस्क फैक्टर को न भूलें
हालांकि नए नियम पारदर्शिता बढ़ा रहे हैं, लेकिन PMS में 'परफॉर्मेंस डिस्पर्शन' (अलग-अलग मैनेजरों के रिटर्न में बड़ा अंतर) का रिस्क बना रहता है। म्यूचुअल फंड के मुकाबले PMS स्ट्रैटेजी ज्यादा स्पेशलाइज्ड होती है, इसलिए केवल शॉर्ट-टर्म रैंकिंग के बजाय मैनेजर के लंबे ट्रैक रिकॉर्ड और उनके इन्वेस्टमेंट दर्शन को समझना बेहद जरूरी है।
