SEBI के सख्त नियमों के बाद Groww जैसे ब्रोकर्स के लिए चुनौती बढ़ गई है। ट्रेडिंग वॉल्यूम में कमी और UPI लागत के बीच, कंपनी अब मार्जिन ट्रेडिंग, कमोडिटी और एसेट मैनेजमेंट पर जोर दे रही है।
भारतीय शेयर बाजार में रेगुलेटरी सख्ती बढ़ गई है। SEBI द्वारा डेरिवेटिव ट्रेडिंग में खुदरा निवेशकों के जोखिम को कम करने के लिए उठाए गए कदमों, जैसे 'क्लोजिंग ऑक्शन सेशन', का सीधा असर इंडस्ट्री के वॉल्यूम पर पड़ा है। चूँकि ब्रोकर्स की कमाई का एक बड़ा हिस्सा इक्विटी डेरिवेटिव्स से आता है, इसलिए आने वाली तिमाहियों में कंपनियों के लिए प्रॉफिट बरकरार रखना एक चुनौती बन गई है।\n\nइसके अलावा, ₹2,000 से ज्यादा के UPI ट्रांजेक्शन पर 0.02% का मर्चेंट डिस्काउंट रेट लगने से ऑपरेशनल लागत भी बढ़ गई है। 29% मार्केट शेयर और 1.33 करोड़ एक्टिव क्लाइंट्स वाली कंपनी Groww अब अपने रेवेन्यू मॉडल को बदल रही है।\n\n### डाइवर्सिफिकेशन पर दांव\n\nकंपनी अब डेरिवेटिव्स पर निर्भरता कम करने के लिए 'मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी' (MTF) को प्राथमिकता दे रही है। इसका MTF बुक साइज ₹3,775 करोड़ तक पहुंच गया है, जो पिछले साल के मुकाबले 3.6 गुना है। साथ ही, कंपनी कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भी विस्तार कर रही है ताकि आय के स्थायी स्रोत (Annuity-like revenue) बनाए जा सकें।\n\nग्रो का एसेट मैनेजमेंट बिजनेस भी तेजी से बढ़ रहा है, जिसका AUM (एसेट्स अंडर मैनेजमेंट) अब ₹5,491 करोड़ हो चुका है। भविष्य में कंपनी अमेरिकी बाजारों में निवेश की सुविधा लाने की भी तैयारी कर रही है।\n\n### रिस्क और आगे की राह\n\nहालांकि कंपनी के यूजर बेस में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और RBI द्वारा ब्याज दरों में संभावित बदलाव जैसे मैक्रो-इकोनॉमिक फैक्टर्स बाजार की भागीदारी को प्रभावित कर सकते हैं। निवेशकों की नजरें अब इस पर टिकी हैं कि कंपनी कितनी प्रभावी ढंग से हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग से हटकर लॉन्ग-टर्म वेल्थ मैनेजमेंट उत्पादों की ओर अपना रुख मोड़ पाती है।
