सितंबर महीने में SIP के जरिए रिकॉर्ड **₹32,490 करोड़** का निवेश आया है। यह पैसा बाजार को गिरने से तो बचा रहा है, लेकिन विदेशी निवेशकों (FIIs) की बिकवाली के दबाव के आगे यह तेजी लाने के लिए काफी नहीं है। अब तक विदेशी निवेशक **₹3 लाख करोड़** से ज्यादा निकाल चुके हैं।
भारतीय शेयर बाजार फिलहाल घरेलू रिटेल निवेशकों के भरोसे और विदेशी संस्थागत निवेशकों की सावधानी के बीच फंसा हुआ है। Choice AMC के डिप्टी सीईओ मनीष जैन के मुताबिक, घरेलू निवेश बाजार के लिए एक 'कुशन' की तरह काम कर रहा है, जो बड़े क्रैश को रोकने में मददगार है, लेकिन यह मार्केट को नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
FIIs की बिकवाली और वैश्विक दबाव
बाजार में जारी उतार-चढ़ाव की मुख्य वजह FIIs का भारी सेल-ऑफ है। साल-दर-साल आधार पर देखें तो विदेशी निवेशकों ने करीब ₹3 लाख करोड़ बाहर निकाले हैं। ऐसे में ग्लोबल सेंटीमेंट और ब्याज दरों में बदलाव का सीधा असर इंडेक्स पर दिख रहा है।
मिडकैप में वैल्युएशन का जोखिम
मिडकैप और स्मॉल-कैप सेगमेंट में रिटेल निवेशकों का उत्साह अब भी बरकरार है। पहली तिमाही में मिडकैप कंपनियों का प्रॉफिट 23% बढ़ा है, जो लार्ज-कैप से बेहतर है। हालांकि, इस ग्रोथ के चलते कई शेयर अब महंगे वैल्युएशन (P/E Multiples) पर ट्रेड कर रहे हैं। यदि कंपनियों के नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे, तो यहां बड़ी गिरावट की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। सुरक्षित रहने के लिए Nifty LargeMidcap 250 जैसे इंडेक्स एक बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं।
ब्याज दरों का कॉर्पोरेट कर्ज पर असर
RBI द्वारा ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी का असर कंपनियों की बैलेंस शीट पर दिखने लगा है। 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड 3 साल के उच्च स्तर के करीब है। इसका सीधा मतलब है कि अब कर्ज लेना महंगा हो गया है। मौजूदा माहौल में उन कंपनियों पर नजर रखें जिनका कर्ज कम है और जो बढ़ती ब्याज दरों के बावजूद अपने प्रॉफिट मार्जिन को सुरक्षित रखने में सक्षम हैं। निवेशकों को अब केवल ग्रोथ नहीं, बल्कि कंपनी की फाइनेंशियल हेल्थ को प्राथमिकता देनी चाहिए।
