Pankaj Tibrewal: 'आसान कर्ज' का दौर खत्म, अब Cash Flow वाली कंपनियों पर लगाएं दांव

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Pankaj Tibrewal: 'आसान कर्ज' का दौर खत्म, अब Cash Flow वाली कंपनियों पर लगाएं दांव

IKIGAI Asset Management के वेटरन इन्वेस्टर Pankaj Tibrewal ने निवेशकों को चेतावनी दी है कि सस्ते कर्ज के भरोसे चलने वाले ग्रोथ मॉडल अब नहीं चलेंगे। उन्होंने निवेशकों को सलाह दी है कि वे उन कंपनियों पर ध्यान दें जो अपने दम पर फंड जुटाने (Internal Cash Flow) में सक्षम हैं।

ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट में बड़ा बदलाव आया है और अब न के बराबर लागत पर कर्ज मिलने का दौर बीत चुका है। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड के ऊंचे स्तर पर बने रहने के कारण अब किसी भी कंपनी के लिए सिर्फ उधार लेकर ग्रोथ करना मुश्किल हो गया है। इस नई हकीकत में निवेशकों को अपनी स्ट्रैटेजी बदलनी होगी—अब फोकस कर्ज पर पलने वाली कंपनियों से हटकर मजबूत बिजनेस फंडामेंटल्स वाली कंपनियों पर होना चाहिए।

वैल्युएशन और भारतीय बाजार की मजबूती

अमेरिका में भले ही टेक्नोलॉजी सेक्टर के ऊंचे वैल्युएशन को लेकर चिंताएं हों, लेकिन भारत की कहानी अलग है। पिछले 2 सालों में Nifty के फॉरवर्ड अर्निंग मल्टीपल्स में करीब 30% की कमी आई है। यह वैल्युएशन एडजेस्टमेंट उन निवेशकों के लिए एक अच्छा मौका है जो मोमेंटम के बजाय फंडामेंटल ग्रोथ को तरजीह देते हैं। घरेलू अर्थव्यवस्था काफी लचीली है और आज का दौर उन कंपनियों के पक्ष में है जो बाहर के कर्ज पर निर्भर रहने के बजाय अपना विस्तार खुद कर सकती हैं।

सेक्टर और स्ट्रैटेजिक फोकस

पोर्टफोलियो अब ऐसी कंपनियों की ओर शिफ्ट हो रहा है जो इंटरनल कैपिटल का बेहतर इस्तेमाल करना जानती हैं। फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस में फिर से दिलचस्पी बढ़ रही है क्योंकि नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) का दबाव अब स्थिर हो रहा है। इसके अलावा, मटेरियल्स सेक्टर—जैसे स्पेशियलिटी केमिकल्स, सीमेंट और मेटल्स—में इंडस्ट्रियल कैपेसिटी यूटिलाइजेशन बढ़ने से मुनाफे को सपोर्ट मिलेगा। हेल्थकेयर सेक्टर में, विशेष रूप से कॉन्ट्रैक्ट डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग (CDMO) में भी काफी संभावनाएं दिख रही हैं।

एनर्जी रिस्क फैक्टर

इस आउटलुक के लिए सबसे बड़ा बाहरी जोखिम कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव है। फिलहाल अर्निंग प्रोजेक्शंस में क्रूड ऑयल की कीमत $90 से $100 प्रति बैरल के बीच मानकर चला गया है। यदि तेल की कीमतें लगातार $110 प्रति बैरल के पार जाती हैं, तो अर्निंग एस्टिमेट्स में कटौती करनी पड़ सकती है। हालांकि, भारत की कम ऑयल इंटेंसिटी और सर्विस एक्सपोर्ट के मजबूत आंकड़े इसे ग्लोबल दबाव से काफी हद तक सुरक्षित रखते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.