Nifty 50: 24,250 के पास अटकी चाल, 'लॉन्ग स्ट्रैडल' ट्रेडिंग में छिपा है ये बड़ा रिस्क!

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Nifty 50: 24,250 के पास अटकी चाल, 'लॉन्ग स्ट्रैडल' ट्रेडिंग में छिपा है ये बड़ा रिस्क!

भारतीय शेयर बाजार का प्रमुख इंडेक्स Nifty 50, पिछले कुछ हफ्तों से 24,250 के आसपास सीमित दायरे में बना हुआ है। बाजार में कम उतार-चढ़ाव (Volatility) के इस माहौल में, कुछ ट्रेडर्स 'लॉन्ग स्ट्रैडल' जैसी ऑप्शन स्ट्रैटेजी अपनाने पर विचार कर रहे हैं। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि अगर बाजार में बड़ा मूव नहीं आया तो आपको प्रीमियम का भारी नुकसान हो सकता है?

Nifty 50 की रेंज-बाउंड कहानी

पिछले कुछ हफ्तों से Nifty 50 इंडेक्स एक तंग दायरे में ट्रेड कर रहा है, जो कि 24,250 के स्तर के आसपास मंडरा रहा है। यह साइडवेज़ मूवमेंट, यानी न तो इंडेक्स में कोई बड़ी बढ़ोतरी हो रही है और न ही भारी गिरावट, बाजार में एक शांत दौर का संकेत दे रहा है। ऐसे में, मार्केट के डर और अनुमानित उतार-चढ़ाव को मापने वाला India VIX इंडेक्स भी फिलहाल 11.23 के आसपास बना हुआ है। इससे ऑप्शन्स के प्रीमियम की लागत भी कम बनी हुई है।

'लॉन्ग स्ट्रैडल' ट्रेडिंग क्या है?

इस माहौल को देखते हुए, कुछ बाजार के जानकार 'लॉन्ग स्ट्रैडल' स्ट्रैटेजी पर चर्चा कर रहे हैं। यह एक ऑप्शन ट्रेडिंग तरीका है जो तब अपनाया जाता है जब ट्रेडर को उम्मीद होती है कि बाजार में बड़ा मूव आएगा, लेकिन दिशा का पता नहीं होता। इस स्ट्रैटेजी में, ट्रेडर एक ही स्ट्राइक प्राइस (Strike Price) और एक ही एक्सपायरी डेट (Expiry Date) के लिए एक 'कॉल' ऑप्शन और एक 'पुट' ऑप्शन दोनों खरीदता है। कॉल ऑप्शन तब फायदा देता है जब बाजार ऊपर जाता है, जबकि पुट ऑप्शन तब फायदा देता है जब बाजार नीचे गिरता है।

दोनों को खरीदकर, ट्रेडर का लक्ष्य होता है कि अगर Nifty अपने मौजूदा तंग दायरे से किसी भी दिशा में बाहर निकलता है, तो उसे फायदा हो। यह स्ट्रैटेजी बाजार की दिशा का अनुमान लगाने पर निर्भर नहीं करती; बस यह जरूरी है कि बाजार इतना बड़ा मूव करे कि दोनों ऑप्शन खरीदने की लागत निकल जाए।

छिपे हुए जोखिम (Hidden Risks)

हालांकि यह स्ट्रैटेजी किसी भी दिशा में होने वाले बड़े मूव का फायदा उठाने का तरीका लगती है, लेकिन इसमें जोखिम भी कम नहीं हैं। सबसे बड़ा चैलेंज है 'टाइम डिके' (Time Decay) या थीटा (Theta)। हर गुजरते दिन के साथ, Nifty अपने मौजूदा दायरे में बना रहता है, तो खरीदे गए ऑप्शन्स का मूल्य कम होता जाता है। अगर एक्सपायरी डेट से पहले इंडेक्स में कोई बड़ा मूव नहीं आता है, तो कॉल और पुट ऑप्शन के लिए चुकाए गए प्रीमियम खत्म हो सकते हैं, जिससे ट्रेड में लगी पूरी पूंजी का नुकसान हो सकता है।

इसके अलावा, निवेशकों को 'IV क्रश' (IV Crush) का भी जोखिम उठाना पड़ता है। अगर अनुमानित उतार-चढ़ाव (Volatility) हकीकत में नहीं आता है या और कम हो जाता है, तो ऑप्शन्स की कीमतें (प्रीमियम) काफी गिर सकती हैं, भले ही इंडेक्स अंततः चलना शुरू कर दे। इसका मतलब है कि ट्रेडर भले ही वोलेटिलिटी के बारे में सही हो, लेकिन फिर भी पैसा खो सकता है क्योंकि ट्रेड शुरू करते समय प्रीमियम की कीमत ज्यादा आंकी गई थी।

आगे की रणनीति

यह तरीका लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी के बजाय एक सट्टा (Speculative) ट्रेडिंग तरीका है। यह आमतौर पर तब इस्तेमाल किया जाता है जब बाजार कंसॉलिडेशन (Consolidation) के अंतिम चरण में हो और एक बड़े ब्रेकआउट की उम्मीद हो। ट्रेडर्स अक्सर सख्त एग्जिट प्लान बनाते हैं - जैसे कि कुछ दिनों के भीतर कोई मूवमेंट न होने पर पोजीशन को बंद कर देना - ताकि टाइम डिके से होने वाले अनावश्यक नुकसान से बचा जा सके।

बाजार पर नजर रखने वाले निवेशकों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि क्या Nifty 24,250 के मौजूदा दायरे को निर्णायक रूप से तोड़ पाता है या कंसॉलिडेशन जारी रखता है। यदि इंडेक्स स्थिर रहता है, तो ऑप्शन्स को होल्ड करने की लागत स्ट्रैटेजी की व्यवहार्यता पर भारी पड़ेगी। जो लोग ऑप्शन ट्रेडिंग की जटिलताओं से अपरिचित हैं, उनके लिए बाजार का स्पष्ट ट्रेंड स्थापित होने तक इंतजार करना अधिक सुरक्षित हो सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.