भारतीय बाजार नवंबर में स्थिरता की तलाश में है, क्योंकि Nifty 50 में इस साल **13%** की गिरावट आ चुकी है। विदेशी निवेशकों ने अपनी आक्रामक मंदी (Bearish bets) कम की है, लेकिन कच्चे तेल की कीमतें और महंगाई अभी भी कॉर्पोरेट मुनाफे के लिए बड़ी चिंता बनी हुई हैं।
अक्टूबर के कठिन दौर के बाद, Nifty 50 अब नवंबर में एक संभावित रिकवरी की ओर देख रहा है। इस साल इंडेक्स में अब तक करीब 13% की गिरावट दर्ज की गई है, जिससे यह 'ओवरसोल्ड' (Oversold) जोन में पहुंच गया है। इसका मतलब है कि बाजार में तेज गिरावट के बाद अब रुकने या मामूली उछाल की गुंजाइश दिख रही है।
FII का बदलता रुख
डेरिवेटिव डेटा से बाजार की सेंटीमेंट में बदलाव साफ दिख रहा है। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII), जो पहले बाजार के खिलाफ भारी दांव लगा रहे थे, उन्होंने अपनी शॉर्ट पोजीशन कम कर दी है। Nifty 50 पर शॉर्ट कॉन्ट्रैक्ट्स 2,67,000 से घटकर 2,21,000 पर आ गए हैं। यह इशारा करता है कि विदेशी फंड अब अपनी आक्रामक नकारात्मक धारणा से हटकर न्यूट्रल हो रहे हैं, हालांकि इसका मतलब अभी बड़ी तेजी नहीं है, बल्कि बिकवाली का दबाव कम होता दिख रहा है।
कच्चे तेल की चुनौती
इस बदलाव के बावजूद, मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिति कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण जटिल बनी हुई है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, और कीमतों में तेजी का सीधा असर कंपनियों के मार्जिन पर पड़ता है। अगर फ्यूल और ट्रांसपोर्ट की बढ़ती लागत को कंपनियां ग्राहकों पर नहीं डाल पाती हैं, तो इसका असर सीधे उनके मुनाफे और शेयर प्राइस पर पड़ता है।
सेक्टर में बंटवारा
बाजार का मौजूदा रुझान अलग-अलग सेक्टरों को लेकर साफ बंटा हुआ है। आईटी (IT) सेक्टर में दम दिख रहा है, जिसने अक्टूबर में 16.3% की बढ़त दर्ज की है। दूसरी ओर, मेटल्स, ऑटो और एफएमसीजी (FMCG) सेक्टरों को लेकर निवेशक सतर्क हैं और उन्हें रक्षात्मक (Defensive) दांव के तौर पर देख रहे हैं।
अहम लेवल पर नजर
आने वाले हफ्तों में ट्रेडर्स की नजर इस बात पर होगी कि क्या बाजार सपोर्ट लेवल को होल्ड कर पाता है। एनालिस्ट्स इंडेक्स के लिए 23,480 से 23,500 की रेंज को बहुत अहम मान रहे हैं। इसके ऊपर का कोई भी ठोस मूवमेंट डाउनट्रेंड में बदलाव का संकेत दे सकता है, लेकिन फिलहाल बाजार को बड़े ट्रिगर्स, जैसे विदेशी निवेश के बड़े इनफ्लो और कच्चे तेल में स्थिरता का इंतजार है।
