भारतीय शेयर बाजार के बेंचमार्क इंडेक्स Nifty 50 के लिए यह दौर पिछले ढाई दशकों में सबसे खराब साबित हुआ है। लगातार आठ हफ्तों की गिरावट ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है, जबकि मिडकैप और स्मॉलकैप सेगमेंट में अभी भी जान बाकी है।
भारतीय शेयर बाजार का बेंचमार्क इंडेक्स Nifty 50 एक गहरे संकट से गुजर रहा है। अक्टूबर 2026 की शुरुआत तक, इंडेक्स ने लगातार 8 हफ्तों की गिरावट दर्ज की है, जो पिछले 25 सालों में इसका सबसे लंबा 'लूजिंग स्ट्रीक' है। साल 2026 के अब तक के आंकड़ों पर नजर डालें तो निफ्टी में करीब 7% से 10% की गिरावट आई है, जबकि इसके उलट Nifty Midcap 100 जैसे इंडेक्स बढ़त बनाए रखने में कामयाब रहे हैं।
कमाई में बड़ा अंतर (Earnings Growth Divergence)
बाजार के जानकारों का मानना है कि निफ्टी की संरचना ही इसकी कमजोरी की मुख्य वजह है। पुराने जमाने की दिग्गज कंपनियां, जो इंडेक्स का हिस्सा हैं, अब उतनी रफ्तार से नहीं बढ़ पा रही हैं। डेटा के मुताबिक, Midcap 150 और Smallcap 250 कंपनियों का प्रॉफिट ग्रोथ रेट क्रमशः 23% और 31% रहा है, जबकि Nifty 50 की कंपनियों का प्रॉफिट ग्रोथ सिर्फ 21% पर सिमट गया है। भारत की $8 ट्रिलियन इकोनॉमी की ओर बढ़ने की कहानी अब निफ्टी से बाहर निकलकर मिड और स्मॉलकैप में ज्यादा नजर आ रही है।
Abakkus Asset Manager के फाउंडर सुनील सिंघानिया का कहना है कि IT सर्विसेज और पारंपरिक ऑयल एंड गैस सेक्टर अब विकास की अपनी सीमाओं तक पहुंच चुके हैं। आज के समय में रिन्यूएबल एनर्जी, डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर और हेल्थकेयर जैसे सेक्टर निवेशकों का ज्यादा ध्यान खींच रहे हैं, जो मुख्य रूप से मिड और स्मॉलकैप इंडेक्स का हिस्सा हैं।
ग्लोबल मार्केट का दबाव
बड़ी कंपनियों के शेयरों पर विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की भारी बिकवाली का दबाव है। अमेरिका में 10-year Treasury yields का 5.3% के ऊपर निकल जाना, जो कि साल 2002 के बाद का उच्चतम स्तर है, वैश्विक पूंजी को भारत जैसे बाजारों से दूर खींच रहा है। इससे लिक्विडिटी की कमी पैदा हो रही है। अब निवेशकों की नजर इस बात पर है कि क्या मिड और स्मॉलकैप कंपनियां अपनी अर्निंग्स मोमेंटम को जारी रख पाएंगी, क्योंकि ग्लोबल बॉरोइंग कॉस्ट का ऊंचा बने रहना अभी भी एक बड़ी चुनौती है।
