Morgan Stanley और JPMorgan Chase जैसी दिग्गज ग्लोबल ब्रोकरेज फर्मों ने NSE के शेयर पर भरोसा जताते हुए इसे 'ओवरवेट' रेटिंग दी है। भारत में बढ़ती फाइनेंशियल सेविंग्स को देखते हुए एक्सपर्ट्स का नजरिया बुलिश है, हालांकि शेयर अभी अपने IPO प्राइस के नीचे कारोबार कर रहा है।
ग्लोबल दिग्गजों को NSE पर भरोसा
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के पब्लिक मार्केट में कदम रखने के बाद से ही ग्लोबल इंस्टीट्यूशंस की नजरें इस पर टिकी हैं। Morgan Stanley और JPMorgan Chase ने स्टॉक को 'Overweight' रेटिंग दी है। ब्रोकरेज फर्म्स ने क्रमशः ₹2,315 और ₹2,130 का टारगेट प्राइस तय किया है। इसके अलावा, Jefferies और 360 ONE Capital Markets ने भी सकारात्मक राय रखते हुए ₹2,085 का टारगेट दिया है।
क्यों बुलिश हैं एनालिस्ट्स?
एनालिस्ट्स की यह उम्मीद भारत में 'फाइनेंशियललाइजेशन' (financialization) के बढ़ते ट्रेंड से जुड़ी है। जैसे-जैसे लोग गोल्ड और रियल एस्टेट से पैसा निकालकर शेयर बाजार में लगा रहे हैं, NSE जैसी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों का बिजनेस बढ़ना तय है। कंपनी का 'एसेट-लाइट' बिजनेस मॉडल इसे अन्य कंपनियों से अलग बनाता है, क्योंकि यहां भारी मशीनों या इन्वेंट्री की जरूरत नहीं होती। कैश और इक्विटी डेरिवेटिव्स में एकाधिकार (monopoly) होने के कारण इसका रेवेन्यू बेस बेहद मजबूत है।
लिस्टिंग के बाद का सफर और चुनौतियां
24 सितंबर, 2026 को लिस्टिंग के बाद से शेयर दबाव में है और ज्यादातर समय अपने इश्यू प्राइस से नीचे ही ट्रेड कर रहा है। हालांकि, फाइनेंशियल ईयर 2026 में कंपनी ने ₹16,601 करोड़ का कंसोलिडेटेड रेवेन्यू और ₹10,302 करोड़ का नेट प्रॉफिट दर्ज किया है, लेकिन रेगुलेटरी मामलों से जुड़े प्रोविजन्स का असर मुनाफे पर साफ दिखा है।
आगे की राह और रिस्क फैक्टर्स
NSE की कमाई का बड़ा हिस्सा इक्विटी डेरिवेटिव्स से आता है, जो एक जोखिम भी है। अगर ऑप्शंस ट्रेडिंग में वॉल्यूम घटता है या सरकारी रेगुलेशन बदलते हैं, तो कंपनी के मुनाफे पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से कंपनी अब कमोडिटी, म्यूचुअल फंड प्लेटफॉर्म्स और इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स जैसे नए वर्टिकल्स पर ध्यान दे रही है। निवेशकों के लिए अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कंपनी इन नए बिजनेस सेगमेंट को कैसे स्केल करती है और रेगुलेटरी बदलावों को कैसे मैनेज करती है।
