जनवरी से जून 2026 के बीच भारत के स्टॉक ब्रोकिंग सेक्टर में सिर्फ 2.8 लाख नए एक्टिव क्लाइंट जुड़े। Groww ने अपना मार्केट शेयर 28.7% तक बढ़ाया, जबकि Zerodha, Angel One और Upstox जैसे प्रमुख ब्रोकर्स के एक्टिव यूजर बेस में गिरावट आई है।
भारत में ब्रोकिंग सेक्टर की धीमी रफ्तार
साल 2026 की पहली छमाही में भारत के स्टॉक ब्रोकिंग इंडस्ट्री में ग्रोथ की रफ्तार काफी धीमी पड़ गई है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के आंकड़ों के मुताबिक, जून के अंत तक एक्टिव क्लाइंट्स की कुल संख्या 4.54 करोड़ हो गई। यह सिर्फ 2.8 लाख क्लाइंट्स की मामूली बढ़ोतरी है, जो पिछले सालों की तेज ग्रोथ के मुकाबले काफी कम है।
प्रमुख ब्रोकर्स के मार्केट शेयर में बड़ा फेरबदल
एक्सचेंज के लेटेस्ट आंकड़ों से पता चलता है कि बड़े रिटेल ब्रोकर्स के प्रदर्शन में साफ अंतर देखने को मिला है। Groww ने अपनी मार्केट पोजीशन को और मजबूत किया है। साल की शुरुआत में 1.24 करोड़ एक्टिव क्लाइंट्स से बढ़कर जून में यह संख्या 1.30 करोड़ हो गई। इस ग्रोथ की बदौलत Groww का कुल एक्टिव क्लाइंट बेस में शेयर बढ़कर 28.7% हो गया, जो जनवरी में 27.7% था।
इसके विपरीत, कई बड़े डिस्काउंट ब्रोकर्स ने अपने एक्टिव यूजर्स में कमी देखी है। Zerodha के एक्टिव क्लाइंट्स 68.6 लाख से घटकर 68 लाख रह गए। Angel One में भी कुछ ऐसी ही स्थिति रही, जहां एक्टिव क्लाइंट्स 67.5 लाख से गिरकर 66.3 लाख हो गए। Upstox को सबसे ज्यादा झटका लगा, जिसके क्लाइंट्स की संख्या साल की शुरुआत के 20.4 लाख से घटकर 18.9 लाख रह गई। वहीं, ICICI Securities के क्लाइंट्स 21.2 लाख तक बढ़े, और Dhan के यूजर्स की संख्या भी बढ़कर 10.7 लाख हो गई।
रेगुलेटरी बदलावों का ट्रेडिंग एक्टिविटी पर असर
नए क्लाइंट्स के जुड़ने में आई यह कमी और कुछ ब्रोकर्स के यूजर बेस में गिरावट, 2024 के अंत में फ्यूचर्स और ऑप्शंस (F&O) सेगमेंट में किए गए अहम रेगुलेटरी बदलावों के बाद देखने को मिली है। इन बदलावों का मकसद रिटेल ट्रेडिंग वॉल्यूम को कंट्रोल करना और मार्केट रिस्क को मैनेज करना था। इन पॉलिसी बदलावों के कारण रिटेल ट्रेडर्स की लगातार ट्रेडिंग में रुचि कम हुई है, जिससे ब्रोकरेज सेक्टर में ग्राहकों को तेजी से जोड़ने का दौर थम गया है।
निवेशकों के लिए, यह ट्रेंड ब्रोकरेज बिजनेस मॉडल में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। अब कंपनियां नए रिटेल ट्रेडर्स के आने से रेवेन्यू ग्रोथ पर निर्भर रहने के बजाय, मौजूदा ग्राहकों को बनाए रखने और कॉम्पिटीटर्स से मार्केट शेयर छीनने पर ज्यादा फोकस कर रही हैं। इस माहौल में ब्रोकर्स की प्रॉफिटेबिलिटी इस बात पर निर्भर करेगी कि वे वेल्थ मैनेजमेंट या लेंडिंग जैसे प्रोडक्ट्स से रेवेन्यू बढ़ाने में कितने सफल होते हैं।
ब्रोकिंग इंडस्ट्री का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि ये कंपनियां नए रेगुलेटरी माहौल के अनुकूल कैसे ढलती हैं और कैपिटल मार्केट में रिटेल पार्टिसिपेशन कैसे स्थिर होता है। निवेशक आने वाले तिमाही नतीजों पर नजर रखेंगे कि क्लाइंट एक्वीजीशन और रिटेंशन में ये बदलाव इन ब्रोकरेज कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन और फाइनेंशियल हेल्थ को कैसे प्रभावित कर रहे हैं।
