Mirae Asset CEO: Nifty 500 क्यों है Nifty 50 से बेहतर बेंचमार्क? जानें कारण

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Mirae Asset CEO: Nifty 500 क्यों है Nifty 50 से बेहतर बेंचमार्क? जानें कारण

Mirae Asset Investment Managers के CEO, स्वरूप मोहंती, ने भारतीय निवेशकों को एक अहम सलाह दी है। उनका कहना है कि पोर्टफोलियो का मूल्यांकन करने के लिए Nifty 50 की बजाय Nifty 500 को बेंचमार्क के तौर पर इस्तेमाल करना चाहिए। उनका मानना है कि Nifty 500 भारतीय बाजार की एक ज़्यादा व्यापक तस्वीर पेश करता है।

क्यों Nifty 500 है ज़्यादा अहम?

स्वरूप मोहंती, जो Mirae Asset Investment Managers (India) के वाइस चेयरमैन और CEO भी हैं, का तर्क है कि Nifty 50, जो सिर्फ 50 सबसे बड़ी कंपनियों को ट्रैक करता है, भारतीय बाजार की पूरी कहानी नहीं बताता। वहीं, Nifty 500, जिसमें 500 कंपनियां शामिल हैं, देश की आर्थिक ग्रोथ और बाजार की चौड़ाई को बेहतर ढंग से दिखाता है। मोहंती के अनुसार, भारतीय बाजार में काफी बदलाव आया है और सिर्फ टॉप 50 कंपनियों पर ध्यान केंद्रित करने से ग्रोथ के अवसरों को गंवाया जा सकता है।

IPOs में मिड-कैप और स्मॉल-कैप का बढ़ता दबदबा

CEO ने यह भी बताया कि हाल के इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग्स (IPOs) में करीब 80% मिड-कैप और स्मॉल-कैप कंपनियों से आए हैं। ऐसे में, यह सोचना कि पोर्टफोलियो का 60% से 70% हिस्सा लार्ज-कैप में रखा जाए, शायद अब सबसे अच्छा तरीका न हो। मोहंती सुझाव देते हैं कि निवेशकों को मैन्युफैक्चरिंग, डिफेंस और प्राइवेट बैंकिंग जैसे उभरते क्षेत्रों में नए व्यवसायों का फायदा उठाने के लिए अपने पोर्टफोलियो में मिड-कैप और स्मॉल-कैप एक्सपोजर बढ़ाना चाहिए।

SIP रोकने की चिंता

सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIPs) भारत में निवेश का एक लोकप्रिय तरीका है, लेकिन मोहंती ने SIP रोकने की ऊंची दर पर चिंता जताई है। उनका मानना है कि ऐसा इसलिए होता है क्योंकि निवेशक अक्सर फंड के हालिया प्रदर्शन (पिछले एक साल का) को देखकर निवेश करते हैं, न कि उसके दीर्घकालिक क्षमता को देखकर। मोहंती के अनुसार, बाजार में उतार-चढ़ाव के दौरान SIP रोकने वाले निवेशक लंबी अवधि में धन बनाने के फायदों से चूक जाते हैं।

एक्टिव या पैसिव? बैलेंस बनाना ज़रूरी

एक्टिव (जहाँ फंड मैनेजर स्टॉक चुनता है) और पैसिव (जहाँ फंड इंडेक्स को ट्रैक करता है) निवेश पर चल रही बहस पर मोहंती का कहना है कि यह 'एक या दूसरा' चुनने का मामला नहीं है, बल्कि पोर्टफोलियो बनाने का तरीका है। पैसिव फंड विशिष्ट थीम, जैसे मैन्युफैक्चरिंग या डिफेंस, तक पहुँचने के लिए उपयोगी हो सकते हैं, जबकि एक्टिव मैनेजमेंट विभिन्न बाजार चक्रों में मदद कर सकता है। वह निवेशकों को बाजार-कैप श्रेणियों पर अकेले ध्यान केंद्रित करने के बजाय, अपने वित्तीय लक्ष्यों और समय-सीमा के अनुरूप मल्टी-एसेट पोर्टफोलियो बनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

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