Kotak Institutional Equities की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय एक्सचेंज अपनी कमाई के लिए ट्रांजैक्शन फीस पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं, जो बाजार की अस्थिरता में रिस्क बढ़ा सकता है। भले ही BSE के मुनाफे में **45%** का उछाल आया हो और शेयर **6%** ऊपर चढ़ा हो, लेकिन लॉन्ग-टर्म स्टेबिलिटी के लिए डेटा और टेक्नोलॉजी जैसे रेवेन्यू मॉडल अपनाना जरूरी है।
भारतीय स्टॉक एक्सचेंज फिलहाल शानदार मुनाफे के दौर से गुजर रहे हैं, लेकिन Kotak Institutional Equities की ताजा रिपोर्ट ने एक बड़ी चिंता की ओर इशारा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, NSE और BSE जैसे एक्सचेंज अपनी कमाई के लिए मुख्य रूप से ट्रांजैक्शन-बेस्ड इनकम पर निर्भर हैं। यह मॉडल बाजार में तेजी के समय तो मार्जिन बढ़ा देता है, लेकिन मार्केट में गिरावट आने पर यह कमाई के लिए बड़ा रिस्क साबित हो सकता है।
आंकड़ों का गणित और मौजूदा रिस्क
NSE के आंकड़ों पर गौर करें तो फाइनेंशियल ईयर 2027 की दूसरी तिमाही तक, ऑपरेटिंग रेवेन्यू का करीब 75% हिस्सा केवल ट्रांजैक्शन फीस से आया है। इस भारी निर्भरता का असर 5 नवंबर, 2026 को देखने को मिला, जब BSE ने 45% का शानदार नेट प्रॉफिट दर्ज किया और शेयर में 6% से ज्यादा की तेजी आई।
ग्लोबल मॉडल की जरूरत
Kotak का मानना है कि भारतीय एक्सचेंजों को Nasdaq, CME और Intercontinental Exchange जैसे ग्लोबल दिग्गजों से सीखना चाहिए। ये कंपनियां ट्रेडिंग वॉल्यूम के अलावा डेटा एनालिटिक्स, इंडेक्स सर्विसेज और टेक्नोलॉजी लाइसेंसिंग से लगातार कमाई (Recurring Revenue) करती हैं, जो बाजार की उतार-चढ़ाव से प्रभावित नहीं होती।
रुकावटें और भविष्य की चुनौतियां
भारत में एक बड़ी बाधा डिपॉजिटरी सर्विसेज के साथ पूर्ण एकीकरण की कमी है। वर्तमान में, एक्सचेंजों की Central Depository Services Ltd (CDSL) और National Securities Depository Ltd (NSDL) में केवल माइनॉरिटी हिस्सेदारी है।
निवेशकों के लिए अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ये एक्सचेंज कैसे अपने बिजनेस मॉडल में बदलाव लाते हैं। हालांकि, नई टेक्नोलॉजी पर ज्यादा खर्च से शुरुआती दौर में मुनाफे पर दबाव भी पड़ सकता है। साथ ही, डेरिवेटिव ट्रेडिंग नियमों में बदलाव जैसे रेगुलेटरी रिस्क हमेशा बने रहेंगे।
