Kotak Institutional Equities ने एक नई रिपोर्ट में कहा है कि इंस्टीट्यूशनल इनफ्लो या आउटफ्लो का शेयर वैल्यूएशन से कोई लेना-देना नहीं है। कंपनी के मुताबिक, मार्केट में पैसा सिर्फ एक हाथ से दूसरे हाथ में जाता है, जबकि शेयर की असली चाल उसके फंडामेंटल्स से तय होती है।
बाजार का 'जीरो-सम' खेल
Kotak Institutional Equities की ताजा रिपोर्ट ने मार्केट में एक पुरानी धारणा को चुनौती दी है। ब्रोकरेज का तर्क है कि सेकेंडरी मार्केट एक 'जीरो-सम गेम' है। जब भी कोई शेयर ट्रेड होता है, तो वह बस एक खरीदार और एक विक्रेता के बीच का ट्रांजैक्शन होता है। इसका मतलब यह है कि पैसा बाजार से बाहर नहीं जाता, बल्कि बस हाथ बदलता है। ऐसे में, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FPI) के पैसे को ट्रैक करना अक्सर निवेशकों के लिए केवल एक शोर (Noise) जैसा है।
असली ड्राइवर क्या हैं?
रिपोर्ट के अनुसार, लंबी अवधि में शेयरों की दिशा तय करने वाले असली फैक्टर दो हैं:
- Earnings Per Share (EPS): यह लंबी अवधि की ग्रोथ का आधार है।
- Price-to-Earnings (P/E) Multiples: यह शॉर्ट-टर्म सेंटीमेंट और वैल्यूएशन का पैमाना है।
जब भी निवेशक कंपनी की भविष्य की कमाई को लेकर अपनी उम्मीदें बदलते हैं, तब शेयर के दाम में बदलाव आता है। यह किसी 'लिक्विडिटी शिफ्ट' का नतीजा नहीं, बल्कि कंपनी के बिजनेस फंडामेंटल्स में बदलाव का संकेत है।
मैक्रो फैक्टर्स का असर
ब्रोकरेज ने यह भी साफ किया है कि मैक्रो फैक्टर्स जैसे कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें, भू-राजनीतिक तनाव या मानसून का असर मार्केट पर जरूर पड़ता है। हालांकि, यह असर इसलिए नहीं होता कि 'लिक्विडिटी' कम या ज्यादा हो गई, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि इन घटनाओं से कंपनी की कैश फ्लो और भविष्य की कमाई पर सीधा असर पड़ता है।
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
निवेशकों को रोजाना की 'इंस्टीट्यूशनल बाइंग-सेलिंग' की खबरों के बजाय कंपनी के फाइनेंशियल हेल्थ पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। मार्जिन ट्रेंड्स, वैल्यूएशन मल्टीपल्स और कंपनी की ग्रोथ ट्रैजेक्टरी ही वो指标 हैं जो आपको यह बताएंगे कि कंपनी वैल्यू बना रही है या किसी स्ट्रक्चरल दबाव का सामना कर रही है।
