Jefferies के मुताबिक भारतीय ऑटो-कंपोनेंट निर्माता कार कंपनियों को पछाड़ रहे हैं। सितंबर तिमाही में 20 में से 9 कंपनियों की अर्निंग्स में अपग्रेड देखा गया है, लेकिन महंगे वैल्यूएशन और सप्लाई चेन के जोखिमों को देखते हुए निवेशकों को सावधान रहने की सलाह दी गई है।
ब्रोकरेज फर्म Jefferies की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, ऑटो-कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियां ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति में हैं। जहाँ ऑटो सेक्टर की बड़ी कंपनियां आर्थिक दबाव झेल रही हैं, वहीं कंपोनेंट मेकर्स ने अपनी प्रॉफिट मार्जिन को बेहतर तरीके से मैनेज किया है और कमोडिटी लागत का बोझ ग्राहकों पर डालने में सफल रहे हैं।
प्रॉफिट में भारी अंतर
जून तिमाही का डेटा एक बड़ा अंतर दिखाता है। Motherson को छोड़कर, ऑटो-कंपोनेंट कंपनियों का रेवेन्यू 21% और ऑपरेटिंग प्रॉफिट (EBIT) 19% (साल-दर-साल) बढ़ा है। इसके उलट, पैसेंजर व्हीकल OEMs का ऑपरेटिंग प्रॉफिट इस दौरान 15% गिर गया। साफ है कि कंपोनेंट सप्लायर्स, गाड़ी बनाने वाली कंपनियों की तुलना में मार्जिन बचाने में ज्यादा सक्षम साबित हुए हैं।
अर्निंग्स में सुधार और भविष्य की राह
सितंबर तिमाही में ट्रैक की गई 20 में से 9 कंपनियों के FY27 EPS अनुमानों को 3% से ज्यादा बढ़ाया गया है। यह जून तिमाही के मुकाबले एक बड़ा सुधार है। इंडस्ट्री का लक्ष्य FY30 तक $200 बिलियन का टर्नओवर हासिल करना है, जो FY26 में $86 बिलियन था।
जोखिम और वैल्यूएशन की चिंता
पॉजिटिव ट्रेंड के बावजूद, सेक्टर की कई कंपनियां अपने लॉन्ग-टर्म ऐतिहासिक औसत से ऊपर ट्रेड कर रही हैं, जिसका मतलब है कि ग्रोथ की उम्मीदें पहले ही कीमतों में शामिल हैं। इसके अलावा, सप्लाई चेन की अस्थिरता, भू-राजनीतिक तनाव, और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की तरफ बढ़ रहे स्ट्रक्चरल बदलाव बड़े चैलेंज हैं। भविष्य में कच्चा माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और डिमांड ग्रोथ सेक्टर के लिए 'की-मॉनिटरेबल्स' बने रहेंगे।
