FY26 में प्रोजेक्ट लोन सैंक्शन में **18%** की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन इसके बावजूद देश में क्रेडिट ग्रोथ रफ्तार नहीं पकड़ पा रही है। यह अंतर संकेत देता है कि कंपनियां अभी भी कर्ज लेकर बड़े विस्तार से बच रही हैं और अपनी इंटरनल कैश का इस्तेमाल कर रही हैं।
भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर में निवेश के मोर्चे पर एक अजीब सा डिस्कनेक्ट देखने को मिल रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2026 के दौरान बैंकों ने प्रोजेक्ट लोन सैंक्शंस में 18% की बढ़ोतरी तो की है, लेकिन यह तेजी वास्तविक क्रेडिट ग्रोथ में तब्दील नहीं हो पा रही है। निवेशकों के लिए यह एक पहेली जैसी स्थिति है, क्योंकि कागजों पर तो मंजूरी बढ़ रही है, लेकिन अर्थव्यवस्था में नया कर्ज उस रफ्तार से नहीं बह रहा।
कंपनियां क्यों हैं सतर्क?
प्राइवेट सेक्टर के लिए प्रोजेक्ट लोन सैंक्शन अभी कुल लोन का महज 3% है, जो पिछले साल के स्तर पर ही टिका हुआ है। इसका मतलब साफ है कि बैंक कर्ज देने के लिए तैयार हैं, लेकिन कंपनियां या तो लोन का पैसा नहीं निकाल रही हैं या फिर वो नए महंगे कर्ज लेने के बजाय अपने पुराने मुनाफे (Internal Accruals) से काम चला रही हैं। ब्याज दरों में अनिश्चितता के कारण कंपनियां कर्ज का बोझ बढ़ाने से बच रही हैं।
पावर सेक्टर का दबदबा
फंडिंग का बड़ा हिस्सा अभी भी इंफ्रास्ट्रक्चर और खास तौर पर पावर सेक्टर में जा रहा है। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्यों में ही ज्यादातर फंडिंग केंद्रित है। हालांकि, रोड और ब्रिज जैसे सेक्टर में नए सैंक्शंस में भारी गिरावट देखी गई है। यह दिखाता है कि रिकवरी अभी हर सेक्टर में एक जैसी नहीं है।
बड़े प्रोजेक्ट्स की कमी
एक बड़ी चुनौती यह है कि ₹50 अरब से बड़े प्रोजेक्ट्स को उतना फंड नहीं मिल पा रहा है जितने की जरूरत है। FY14 के बाद से इन बड़े प्रोजेक्ट्स का ग्राफ नीचे आया है, जो आमतौर पर क्रेडिट डिमांड को रफ्तार देने का काम करते थे। फिलहाल, निवेशकों को यह नजर रखनी होगी कि क्या कंपनियां केवल अपनी नकदी पर निर्भर रहेंगी या भविष्य में बड़े इंफ्रा प्रोजेक्ट्स के लिए कर्ज का रास्ता चुनेंगी।
