भारत के इक्विटी ऑप्शंस मार्केट से अब एक्सचेंजों की **70%** कमाई हो रही है, और यह **56% CAGR** से बढ़ रहा है। हालांकि, SEBI के नए नियम रिटेल ट्रेडर्स के घाटे को कम करने के लिए ग्रोथ को धीमा कर रहे हैं।
भारतीय एक्सचेंजों का बदला तस्वीर: ऑप्शंस बने कमाई का जरिया
भारतीय फाइनेंशियल एक्सचेंजों के परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव आया है। अब इक्विटी ऑप्शंस (Equity Options) इंडस्ट्री की कमाई का मुख्य जरिया बन गए हैं। जेफरीज़ (Jefferies) की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, FY26 के अंत तक घरेलू एक्सचेंजों की कुल ऑपरेटिंग रेवेन्यू (Operating Revenue) का लगभग 70% हिस्सा इक्विटी ऑप्शंस से आया। FY20 से FY26 के बीच इस सेगमेंट में 56% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) दर्ज की गई, जबकि कैश मार्केट (Cash Market) में केवल 19% की वृद्धि देखी गई।
रेवेन्यू में बदलाव और एक्सचेंज का प्रदर्शन
निवेशकों के लिए, यह बदलाव इस मायने में महत्वपूर्ण है कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और बीएसई (BSE) जैसे एक्सचेंज अब कमाई कैसे करते हैं। उनकी आय अब स्टॉक की कीमतों में सीधी वृद्धि के बजाय मार्केट की वोलैटिलिटी (Volatility) पर अधिक निर्भर करती है। FY26 में इंडस्ट्री का कंसोलिडेटेड रेवेन्यू ₹24,400 करोड़ तक पहुँच गया, जिसमें NSE ने 90% से अधिक मार्केट शेयर बनाए रखा। कैश, इक्विटी डेरिवेटिव्स (Equity Derivatives) और कमोडिटी (Commodity) सेगमेंट में विविधता लाने की इसकी क्षमता इसके प्रदर्शन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
जबकि FY26 में ऑप्शंस प्रीमियम का टर्नओवर (Turnover) दैनिक आधार पर अनुमानित ₹77,200 करोड़ था, इंडस्ट्री को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) नवंबर 2024 से लगातार रेगुलेटरी उपाय लागू कर रहा है ताकि खास तौर पर रिटेल प्रतिभागियों के बीच अत्यधिक जोखिम लेने की प्रवृत्ति को रोका जा सके। इन उपायों में इंडेक्स ऑप्शन एक्सपायरी (Index Option Expiry) पर सीमाएं और कॉन्ट्रैक्ट साइज़ (Contract Size) में वृद्धि शामिल है, जिसका ट्रेडिंग एक्टिविटी पर पहले से ही असर दिखना शुरू हो गया है।
रिटेल जोखिमों का समाधान और बाज़ार का आउटलुक
इस ग्रोथ की स्थिरता को लेकर चिंताएं व्यक्तिगत निवेशकों के वित्तीय स्वास्थ्य से जुड़ी हैं। SEBI के आंकड़ों से पता चला है कि दिसंबर 2024 और मई 2025 के बीच, व्यक्तिगत ट्रेडर्स ने इक्विटी डेरिवेटिव्स सेगमेंट में कुल ₹1.05 लाख करोड़ का घाटा उठाया। ये आंकड़े छोटे बाजार प्रतिभागियों के लिए महत्वपूर्ण जोखिमों को उजागर करते हैं, जो वॉल्यूम का एक बड़ा हिस्सा देते हैं लेकिन अक्सर अस्थिर डेरिवेटिव इंस्ट्रूमेंट्स को नेविगेट करने में चुनौतियों का सामना करते हैं।
आगे बढ़ते हुए, इंडस्ट्री में ग्रोथ की गति में बदलाव की उम्मीद है। जेफरीज़ का अनुमान है कि FY30 तक इक्विटी ऑप्शंस की ग्रोथ घटकर 9-11% CAGR हो जाएगी। इसके विपरीत, कैश इक्विटी (Cash Equities) में 14-16% और कमोडिटी ऑप्शंस में 20-25% की वृद्धि की उम्मीद है। निवेशकों के लिए मुख्य निगरानी यह होगी कि एक्सचेंज सख्त रेगुलेटरी व्यवस्था के तहत मार्जिन बनाए रखने के लिए अपने प्रोडक्ट ऑफरिंग को कैसे अनुकूलित करते हैं। भविष्य के अपडेट्स में संभवतः यह फोकस होगा कि क्या मंथली इंडेक्स एक्सपायरी (Monthly Index Expiry) और अन्य कॉन्ट्रैक्ट परिवर्तनों की ओर बदलाव, रेगुलेटर के व्यक्तिगत रिटेल निवेशकों की सुरक्षा के लक्ष्य के साथ मार्केट वॉल्यूम को प्रभावी ढंग से संतुलित करता है।
