भारतीय ब्रोकरेज फर्म्स अब कमीशन के बजाय मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) के जरिए लोन देने पर फोकस कर रही हैं। इंडस्ट्री की कुल MTF बुक ₹1.52 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर को पार कर चुकी है, जो निवेशकों के लिए नए अवसर और जोखिम दोनों लेकर आई है।
भारतीय ब्रोकरेज इंडस्ट्री में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। ट्रांजैक्शन कमीशन पर निर्भर रहने वाली कंपनियां अब 'लेंडिंग' बिजनेस की ओर शिफ्ट हो रही हैं। जैसे-जैसे मार्केट में कॉम्पिटिशन बढ़ा है, ब्रोकरेज शुल्क में भारी गिरावट आई है। एक दशक पहले जहाँ प्रति ऑर्डर औसत फीस ₹20-25 होती थी, वह अब गिरकर महज ₹3-5 के आसपास सिमट गई है। इस कमी को पूरा करने के लिए अब ब्रोकर मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) के जरिए ग्राहकों को पैसा उधार देकर ब्याज (Interest) से कमाई कर रहे हैं।\n\n### बड़ी कंपनियों की रणनीति\n\nइस बदलाव में सभी ब्रोकर अलग-अलग तरीके अपना रहे हैं। Angel One इस दौड़ में काफी आगे है, जिसकी MTF बुक जून 2026 तक ₹7,150 करोड़ तक पहुंच चुकी है। वहीं, Groww जैसे प्लेयर्स भी इस स्पेस में अपनी पैठ बना रहे हैं, जिनके पास अभी लेंडिंग पोर्टफोलियो बढ़ाने की काफी गुंजाइश है। यह मॉडल कंपनियों को ट्रेडिंग वॉल्यूम में आने वाली गिरावट से तो बचाता है, लेकिन इसके साथ नए रिस्क भी जुड़े हैं।\n\n### सेबी (SEBI) की नजर और रिस्क फैक्टर\n\nलोन बुक में हो रही इस बेतहाशा बढ़ोतरी ने रेगुलेटर का ध्यान खींचा है। सेबी अब MTF फ्रेमवर्क की समीक्षा कर रहा है और ब्रोकरों के लिए न्यूनतम नेट-वर्थ (Net-worth) की शर्त को बढ़ाने का प्रस्ताव है। सबसे बड़ा डर 'रॉन्ग-वे रिस्क' (Wrong-way Risk) का है, जहाँ मार्केट गिरने पर गिरवी रखे गए शेयरों की वैल्यू कम हो जाती है, जिससे ब्रोकरों के सामने लिक्विडिटी का संकट पैदा हो सकता है।\n\nनिवेशकों को अब कंपनियों के क्वार्टरली अपडेट्स के साथ-साथ उनके क्रेडिट क्वालिटी और रेगुलेटरी नियमों में होने वाले किसी भी बदलाव पर कड़ी नजर रखनी होगी।
