भारत का गोल्ड लोन मार्केट तेजी से बढ़ रहा है और 2028 तक इसके **₹30 लाख करोड़** तक पहुंचने का अनुमान है। हालांकि, रिटेल इन्वेस्टर्स को रिपीट बॉरोइंग और बैंकों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा जैसे रिस्क पर भी नजर रखनी होगी।
ग्रोथ की रफ्तार और आंकड़े
मोतीलाल ओसवाल की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का गोल्ड लोन सेक्टर FY26 से FY28 के बीच 28% की सालाना दर से बढ़ने की उम्मीद है। यह सेक्टर अब होम लोन के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा रिटेल एसेट क्लास बन चुका है, जिसने पर्सनल लोन को भी पीछे छोड़ दिया है। मार्च 2026 तक इस मार्केट की वैल्यू ₹18.6 लाख करोड़ आंकी गई थी।
क्या है इस तेजी के पीछे की वजह?
इस ग्रोथ के पीछे मुख्य रूप से असंगठित क्षेत्र से संगठित वित्तीय संस्थानों की ओर शिफ्ट होना है। देश के परिवारों के पास करीब 28,000 टन सोना है, लेकिन इसमें से सिर्फ 8% का ही उपयोग फॉर्मल लेंडिंग के लिए हो पा रहा है। डिजिटल प्रोसेस और आसान एक्सेसिबिलिटी के चलते अब लोग अपने गोल्ड का इस्तेमाल लोन लेने के लिए तेजी से कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए चेतावनी के संकेत (Risks)
ग्रोथ के साथ-साथ कुछ चुनौतियां भी हैं जो निवेशकों को समझनी चाहिए। सबसे बड़ी चिंता 'रिपीट बॉरोइंग' है। 2025 में कुल गोल्ड लोन में से 82% लोन उन ग्राहकों को दिए गए जो पहले भी लोन ले चुके थे, जबकि 2022 में यह आंकड़ा 76% था। यह दर्शाता है कि मार्केट का विस्तार नए ग्राहकों से नहीं, बल्कि पुराने ग्राहकों के कर्ज के बोझ से हो रहा है, जो ओवरलेवरेजिंग का रिस्क पैदा करता है।
बैंक बनाम NBFC की लड़ाई
मार्च 2026 तक पब्लिक सेक्टर बैंकों ने मार्केट में 60% हिस्सेदारी पर कब्जा कर लिया है। बैंकों की सस्ती फंडिंग और बड़े ब्रांच नेटवर्क के कारण स्टैंडअलोन गोल्ड लोन कंपनियों के मुनाफे और मार्जिन पर दबाव बढ़ रहा है।
भविष्य की राह
आगे का रास्ता सोने की कीमतों (Gold Prices) और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के नियमों पर निर्भर करेगा। सोने के दाम में गिरावट कोलैटरल की वैल्यू घटा सकती है, जिससे डिफॉल्ट बढ़ सकते हैं। आने वाले समय में कंपनियों के नतीजों में यह देखना जरूरी होगा कि वे कितने नए ग्राहकों को जोड़ने में सफल होती हैं, न कि सिर्फ पुराने ग्राहकों को टॉप-अप लोन देने में।
