Groww Mutual Fund के हेड ऑफ इक्विटीज अनुपम तिवारी ने चेतावनी दी है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और ग्लोबल तनाव भारतीय कंपनियों के मुनाफे में रुकावट डाल सकते हैं। उन्होंने कहा कि घरेलू निवेशकों का पैसा सिर्फ वैल्युएशन को ऊंचे स्तर पर नहीं टिका सकता अगर कंपनियों का प्रॉफिट नहीं बढ़ा।
सितंबर 2026 की तिमाही के नतीजों (Earnings Season) के आने से पहले ही बाजार के जानकारों की चिंता बढ़ गई है। इसकी मुख्य वजह है अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और पश्चिम एशिया में बना भू-राजनीतिक तनाव। Groww Mutual Fund के हेड ऑफ इक्विटीज अनुपम तिवारी का मानना है कि ये बढ़ती ऊर्जा लागत भारतीय कंपनियों के मार्जिन (Profit Margins) के लिए बड़ी चुनौती बन रही है।
आयात पर निर्भरता और लागत का दबाव
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। जब कच्चे तेल की कीमत $100 प्रति बैरल के स्तर को छूती है, तो कंपनियों के लिए लॉजिस्टिक्स, रॉ मटेरियल और ऊर्जा का खर्च अचानक बढ़ जाता है। इसका सीधा असर कंपनियों के नेट प्रॉफिट पर पड़ता है, जिससे उनके लिए निवेशकों की उम्मीदों के मुताबिक ग्रोथ बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।
मार्केट वैल्युएशन बनाम परफॉर्मेंस
अनुपम तिवारी ने इस बात पर जोर दिया कि देश के घरेलू निवेशकों ने SIP के जरिए बाजार में काफी भरोसा जताया है, लेकिन मार्केट प्राइस और कंपनियों की परफॉर्मेंस के बीच एक अंतर दिख रहा है। सिर्फ घरेलू खरीदारी के दम पर स्टॉक वैल्युएशन को लंबे समय तक ऊंचा नहीं रखा जा सकता। यदि कंपनियों का मुनाफा नहीं बढ़ा, तो बाजार में ठहराव (Stagnation) आ सकता है।
RBI और महंगाई की चुनौती
ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के कारण महंगाई (Inflation) का दबाव बना हुआ है, जिससे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लिए ब्याज दरों पर फैसला लेना मुश्किल हो रहा है। अगर महंगाई दर ऊंची बनी रहती है, तो कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाएगा, जिससे उनके बिजनेस विस्तार और कैश फ्लो पर बुरा असर पड़ सकता है। इसके अलावा, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की बिकवाली और रुपये की कमजोरी भी इक्विटी इंडेक्स के लिए जोखिम बढ़ा रही है।
निवेशकों के लिए सलाह
इस उतार-चढ़ाव वाले बाजार में विशेषज्ञों का सुझाव है कि निवेशकों को सतर्क रहना चाहिए और अपने पोर्टफोलियो में विविधता लानी चाहिए। केवल एक ही रणनीति पर टिके रहने के बजाय मल्टी-एसेट या हाइब्रिड फंड्स का सहारा लेना समझदारी हो सकती है। आने वाले दिनों में मैन्युफैक्चरिंग और ट्रांसपोर्ट जैसे सेक्टरों पर नजर रखना जरूरी है, क्योंकि ये कच्चे तेल की कीमतों के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील होते हैं।
