ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म Bernstein ने भारतीय शेयर बाजार को लेकर न्यूट्रल रुख अपनाया है। फर्म ने चेतावनी दी है कि विकास सरकारी सब्सिडी पर टिका है, न कि कोर प्रोडक्टिविटी पर, और Nifty 50 के लिए साल का टारगेट **26,000** रखा है।
ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म Bernstein ने भारतीय इक्विटीज पर अपनी राय को न्यूट्रल कर दिया है और साल के अंत तक के लिए Nifty 50 का टारगेट 26,000 रखा है। फर्म की हालिया एनालिसिस में यह सवाल उठाया गया है कि क्या भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा मजबूती ऑर्गेनिक है या यह केवल सरकारी हस्तक्षेप का नतीजा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय इकॉनमी फिलहाल फिस्कल सपोर्ट पर टिकी है, जो लंबी अवधि में टिकाऊ नहीं हो सकती।
मुनाफे और रेवेन्यू के बीच की खाई
ब्रोकरेज ने एक बड़ी चिंता यह जताई है कि NSE 200 कंपनियों का रेवेन्यू 10 तिमाहियों के उच्चतम स्तर पर है, लेकिन नेट प्रॉफिट ग्रोथ केवल 7% से 8% के दायरे में सिमट गई है। यह अंतर साफ दिखाता है कि कंपनियां बिना सरकारी सपोर्ट के अपने प्रॉफिट मार्जिन को बनाए रखने में संघर्ष कर रही हैं। अधिकतर कंज्यूमर-फेसिंग कंपनियों में प्राइसिंग पावर की कमी देखी गई है, जिसके कारण वे बढ़ती लागत का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पा रही हैं।
AI और स्ट्रक्चरल चुनौतियां
Bernstein ने भविष्य की चुनौतियों पर भी रोशनी डाली है। फर्म का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ऑटोमेशन सर्विस सेक्टर को बुरी तरह प्रभावित कर सकते हैं, जो भारत की ग्रोथ का इंजन रहा है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के बारे में भी ब्रोकरेज सतर्क है, क्योंकि हालिया ग्रोथ लेबर प्रोडक्टिविटी के बजाय सब्सिडी-आधारित नीतियों पर अधिक निर्भर रही है।
PFC और REC पर असर
इस सावधानी भरे रुख का असर कुछ खास सेक्टरों और कंपनियों पर भी पड़ा है। Bernstein ने पावर फाइनेंस कंपनियों जैसे PFC और REC के टारगेट प्राइस में कटौती की है। इसका कारण बढ़ता कॉम्पिटिशन और लोन ग्रोथ में कमी के शुरुआती संकेत बताए जा रहे हैं। रिपोर्ट में निवेशकों को सलाह दी गई है कि वे उन कंपनियों पर नजर रखें जिनके पास सस्टेनेबल प्राइसिंग पावर है, न कि उन पर जो केवल सरकारी स्कीमों के भरोसे चल रही हैं।
