ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म Bernstein की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, अगले एक साल तक विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) का प्रवाह भारत में सीमित रह सकता है। शेयर बाजार के ऊंचे वैल्यूएशन और करेंसी में अस्थिरता के कारण बड़े निवेशक फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं।
वैल्यूएशन की चुनौती
ब्रोकरेज का मानना है कि भारतीय शेयरों का मौजूदा वैल्यूएशन काफी महंगा हो चुका है। जब शेयर की कीमतें कंपनी के मुनाफे की तुलना में बहुत अधिक बढ़ जाती हैं, तो विदेशी निवेशक अक्सर बैकफुट पर आ जाते हैं। इतिहास गवाह है कि जब भी भारतीय बाजार प्रीमियम वैल्यूएशन पर ट्रेड करते हैं, तो विदेशी फंड्स का इंटरेस्ट घट जाता है। अगर कंपनियों का मुनाफा इस तेजी के साथ कदम नहीं मिलाता, तो ग्लोबल फंड मैनेजर और बेहतर एंट्री पॉइंट का इंतजार करना पसंद करेंगे।
करेंसी रिस्क का असर
निवेशकों की चिंता में एक बड़ा फैक्टर 'करेंसी स्टेबिलिटी' भी है। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रुपये के प्रदर्शन और FII के निवेश के बीच 70% से ज्यादा का सीधा संबंध है। डॉलर में निवेश करने वाले निवेशकों के लिए, रुपये में कमजोरी मुनाफे को कम कर देती है, भले ही स्टॉक अच्छा प्रदर्शन कर रहा हो।
नए ग्रोथ ड्राइवर्स की तलाश
विदेशी फंड अब सिर्फ मैक्रोइकॉनॉमिक ग्रोथ नहीं, बल्कि ग्लोबल लेवल पर टिकने वाली कंपनियों की तलाश में हैं। Bernstein का कहना है कि भारत को अब सेमीकंडक्टर, एडवांस्ड एनर्जी स्टोरेज और डीप-टेक जैसे क्षेत्रों में ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस साबित करनी होगी। फिलहाल डिफेंस और स्पेस सेक्टर में प्रगति तो हुई है, लेकिन ग्लोबल निवेशकों के लिए ये सेक्टर अभी भी बड़े पोर्टफोलियो एलोकेशन के हिसाब से छोटे हैं।
निवेशकों के लिए संकेत
घरेलू निवेशकों को अब कंपनियों के मुनाफे और अर्निंग रिविजन्स (Earnings Revisions) पर कड़ी नजर रखनी होगी। बाजार यह देखना चाहेगा कि क्या भारतीय कंपनियां मौजूदा महंगे दामों को सही ठहराने के लिए उतना मुनाफा कमा सकती हैं। साथ ही, रुपये की चाल और बड़े मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट्स की प्रोग्रेस ही तय करेगी कि कब विदेशी पैसा वापस तेजी से भारतीय बाजार में लौटेगा।
