Indian Market: FIIs ने भारत से निकाले **$40 अरब**, क्या स्टैगनेशन बना है बड़ी मुसीबत?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Indian Market: FIIs ने भारत से निकाले **$40 अरब**, क्या स्टैगनेशन बना है बड़ी मुसीबत?

Bernstein की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो सालों में विदेशी निवेशकों (FIIs) ने भारतीय बाजारों से लगभग **$40 बिलियन** की भारी निकासी की है। रिपोर्ट के मुताबिक, लार्ज-कैप कंपनियों की सुस्त रफ्तार और मिड-कैप क्षेत्र की संरचनात्मक चुनौतियों के चलते विदेशी फंड्स फिलहाल दूरी बनाए हुए हैं।

पिछले दो वर्षों में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) का भारतीय इक्विटी मार्केट से मोहभंग होता दिख रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान करीब $40 बिलियन की पूंजी बाहर निकली है। ब्रोकरेज फर्म Bernstein की रिपोर्ट साफ करती है कि जब तक भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर में बुनियादी बदलाव नहीं आते, तब तक इस ट्रेंड को पलटना मुश्किल है।

लार्ज-कैप में सुस्ती की चिंता

रिपोर्ट के अनुसार, बड़ी कंपनियों की परफॉरमेंस और बाजार की उम्मीदों के बीच बड़ा अंतर है। कई पुरानी लार्ज-कैप फर्में इनोवेशन के बजाय अपने पुराने बिजनेस मॉडल को बचाने में लगी हैं। ग्लोबल लेवल पर एडवांस्ड एनर्जी, सेमीकंडक्टर्स और बैटरी स्टोरेज जैसे सेक्टर्स में मुकाबला करने की क्षमता पर निवेशकों को अब संदेह होने लगा है।

मिड-कैप और स्मॉल-कैप की चुनौतियां

निवेशक भले ही ग्रोथ के लिए मिड-कैप और स्मॉल-कैप (SMID) का रुख कर रहे हों, लेकिन ग्लोबल फंड्स के लिए यहां लिक्विडिटी का संकट एक बड़ी बाधा है। बड़ी मात्रा में शेयर खरीदना या बेचना मुश्किल होता है, जिससे प्राइस पर असर पड़ता है। साथ ही, इन कंपनियों के पास 'इंस्टीट्यूशनल-ग्रेड' एनालिस्ट कवरेज की कमी है, जिससे बड़े फंड्स के लिए सही चुनाव करना कठिन हो जाता है।

रिटर्न्स का फासला

निवेशकों की नाराजगी के पीछे बीते 10 सालों का खराब रिटर्न भी है। डॉलर के टर्म में Nifty ने सालाना केवल 6% के करीब रिटर्न दिया है, जिसे ग्लोबल मैनेजर्स जोखिम और वैल्यूएशन के हिसाब से कम मान रहे हैं। मौजूदा समय में, भारत का मैन्युफैक्चरिंग इनोवेशन पर कम और कंजम्पशन-लेड ग्रोथ पर ज्यादा निर्भर रहना विदेशी निवेशकों के लिए एक कठिन सौदा बन गया है।

अब सबकी नजर इस पर है कि क्या भारतीय कंपनियां पारंपरिक तौर-तरीकों को छोड़कर ग्लोबल स्तर पर प्रतिस्पर्धी उद्योगों में अपनी जगह बना पाएंगी या नहीं। जब तक बदलाव के ठोस संकेत नहीं दिखते, विदेशी फंड्स अन्य उभरते बाजारों को वरीयता देते रहेंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.