Generative AI की वजह से भारतीय IT कंपनियों का पुराना रेवेन्यू मॉडल खतरे में है। BNP Paribas के मुताबिक 'AI-led deflation' के चलते कंपनियों को अपनी सर्विस प्राइजिंग कम करनी पड़ रही है, जिससे Nifty IT इंडेक्स पर लगातार दबाव बना हुआ है।
भारतीय आईटी सेक्टर इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। जनरेटिव AI (Generative AI) के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल ने कारोबार के पुराने तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। BNP Paribas के एनालिस्ट कुमार राकेश ने इसे 'AI-led deflation' का नाम दिया है, जो पूरे सेक्टर के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
पुराना मॉडल हुआ पुराना
पिछले कई दशकों से भारतीय आईटी कंपनियां 'हेडकाउंट-बेस्ड मॉडल' पर काम कर रही थीं, जहाँ ज्यादा इंजीनियरों को भर्ती करके क्लाइंट्स से बिल वसूला जाता था। लेकिन अब AI के आने से कोडिंग, टेस्टिंग और मेंटेनेंस जैसे काम ऑटोमेट हो रहे हैं। इससे कंपनियों को अब बड़े मैनपावर की जरूरत कम हो गई है।
मार्जिन पर दबाव
जैसे-जैसे AI काम को आसान बना रहा है, क्लाइंट्स अब लागत में कमी (Cost Savings) की मांग कर रहे हैं। मार्केट में कॉम्पिटिटिव बने रहने के लिए आईटी कंपनियां अपनी उत्पादकता का फायदा सीधे क्लाइंट्स को दे रही हैं, जिससे रेवेन्यू ग्रोथ पर दबाव बढ़ गया है। यह वह स्थिति है जहाँ रेवेन्यू और कर्मचारियों की संख्या के बीच का पुराना रिश्ता टूट रहा है।
लार्ज-कैप कंपनियों की चुनौती
बड़ी आईटी कंपनियां अपने पुराने लेगेसी पोर्टफोलियो (Legacy Portfolios) के कारण फंस गई हैं। इन कंपनियों के पास ऐसे लंबे कॉन्ट्रैक्ट्स हैं जिन्हें तुरंत बदलना मुमकिन नहीं है। वहीं, कुछ मिड-कैप कंपनियां अधिक फुर्ती (Agility) दिखा रही हैं और खुद को नीश (Niche) सेगमेंट में ढालने की कोशिश कर रही हैं।
बाजार पर असर
इस स्ट्रक्चरल बदलाव का असर 2026 में बाजार पर साफ दिखा है। Nifty IT इंडेक्स इस साल अब तक 24% से 28% तक गिर चुका है। निवेशक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि AI से आने वाला रिटर्न अभी बहुत धीमा है। इसके अलावा, ग्लोबल क्लाइंट्स भी अनिश्चितता के कारण खर्च करने से बच रहे हैं।
आने वाले समय में निवेशकों को यह देखना होगा कि कौन सी कंपनियां बिना कर्मचारियों की संख्या बढ़ाए अपना रेवेन्यू बढ़ाने में कामयाब होती हैं। यही क्षमता आने वाले समय में कंपनियों के मार्जिन को बचाए रखने का सबसे बड़ा पैमाना होगी।
