Avendus Wealth ने हालिया बाजार गिरावट के बाद बेहतर वैल्यूएशन को देखते हुए फ्लेक्सी-कैप इक्विटी में अपना निवेश बढ़ाया है। फर्म अब मिड- और स्मॉल-कैप सेगमेंट के मुकाबले लार्ज-कैप स्टॉक्स को तरजीह दे रही है, जबकि कई अल्टरनेटिव एसेट्स पर सतर्क रुख बनाए हुए है।
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Avendus Wealth की बदली रणनीति: फ्लेक्सी-कैप फंड्स पर दांव
Avendus Wealth ने अपनी निवेश रणनीति में अहम बदलाव करते हुए फ्लेक्सी-कैप इक्विटी को 'ओवरवेट' (Overweight) पोजीशन पर ला दिया है। यह कदम इस साल की पहली तिमाही में बाजार में आई बड़ी अस्थिरता के बाद उठाया गया है। आपको बता दें कि इस दौरान निफ्टी 50 ने डॉलर टर्म्स में करीब 19% की गिरावट दर्ज की, जबकि मिड-कैप और स्मॉल-कैप इंडेक्स 17% से 18% तक टूटे थे।
फ्लेक्सी-कैप फंड्स, जो मार्केट कैप के अनुसार कहीं भी निवेश करने की सुविधा देते हैं, उन्हें तरजीह देकर फर्म खुद को लार्ज-कैप स्टॉक्स की संभावित रिकवरी का फायदा उठाने के लिए तैयार कर रही है। ये स्टॉक्स फिलहाल अपने हालिया ऐतिहासिक औसत के मुकाबले ज्यादा आकर्षक वैल्यूएशन पर दिख रहे हैं।
वैल्यूएशन में आई कमी और सेक्टर्स पर फोकस
मौजूदा समय में निफ्टी 50 का वैल्यूएशन 16.9 गुना एक साल के फॉरवर्ड आय पर है, वहीं BSE 500 18.1 गुना पर कारोबार कर रहा है। ये दोनों ही आंकड़े अपने 10 साल के औसत से एक स्टैंडर्ड डेविएशन नीचे हैं। प्राइस-टू-अर्निंग मल्टीपल्स में आई इस कमी ने वेल्थ मैनेजर के लिए लार्ज-कैप में मौके ज्यादा आकर्षक बना दिए हैं।
अपनी रणनीति के तहत, फर्म का फोकस बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विसेज के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग जैसे स्ट्रक्चरल थीम्स पर बना हुआ है। इसके अलावा, मजबूत ऑर्डर बुक वाली कंपनियों, खासकर डिफेंस और कैपिटल गुड्स सेक्टर में, साथ ही ऑटोमोबाइल और हेल्थकेयर जैसे क्षेत्रों में अपनी प्राइसिंग पावर साबित कर चुकी कंपनियों में भी फर्म की दिलचस्पी है।
एसेट्स में रणनीतिक बदलाव
फ्लेक्सी-कैप इक्विटी के अलावा, Avendus ने अन्य एसेट क्लास पर भी अपना रुख बदला है। मिड- और स्मॉल-कैप इक्विटी, साथ ही गोल्ड, सिल्वर और REITs व InvITs जैसे इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स को 'न्यूट्रल' (Neutral) रेटिंग पर रखा गया है। हाई-यील्ड क्रेडिट को भी 'ओवरवेट' से घटाकर 'न्यूट्रल' कर दिया गया है।
फिक्स्ड इनकम के लिए, फर्म ऊंचे यील्ड के चलते AAA-रेटेड बॉन्ड्स और नॉन-कनवर्टिबल डिबेंचर्स को प्राथमिकता दे रही है। वहीं, पोस्ट-टैक्स रिटर्न को बेहतर बनाने के लिए हाइब्रिड स्पेशलाइज्ड फंड्स या आर्बिट्राज-प्लस स्ट्रेटेजी की ओर देखने का सुझाव दिया गया है।
मैक्रो और जियोपॉलिटिकल जोखिम
जहां फर्म डोमेस्टिक इक्विटी पर सकारात्मक नजरिया बनाए हुए है, वहीं ग्लोबल दबावों को लेकर भी सतर्क है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक स्थिति पर बारीकी से नजर रखी जा रही है, खासकर कच्चे तेल की कीमतों पर इसके संभावित असर को लेकर।
हालांकि, FY27 तक 90 डॉलर प्रति बैरल के करीब ब्रेंट क्रूड कीमतों को संभालने के लिए भारत का मौजूदा फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व और लिक्विडिटी बफर पर्याप्त माना जा रहा है, लेकिन इस स्तर से ऊपर तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी ट्रेड बैलेंस और घरेलू महंगाई पर दबाव डाल सकती है। निवेशक इन मैक्रो इंडिकेटर्स के विकसित होने पर नजर रख सकते हैं, क्योंकि सप्लाई चेन या ऊर्जा लागत का दबाव भविष्य में कॉर्पोरेट मार्जिन की स्थिरता और बाजार के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकता है।
