FY27 की दूसरी तिमाही में भारतीय ऑटो कंपनियों का रेवेन्यू तो शानदार रहने का अनुमान है, लेकिन कच्चे माल (Raw Materials) की ऊंची कीमतों ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। फेस्टिव डिमांड के बावजूद प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव दिख सकता है।
भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए फाइनेंशियल ईयर 2027 की दूसरी तिमाही मिली-जुली तस्वीर पेश कर रही है। एक तरफ फेस्टिव सीजन की दमदार डिमांड से बिक्री के आंकड़े मजबूत दिख रहे हैं, तो दूसरी तरफ स्टील, एल्युमीनियम और रबर जैसे कच्चे माल की महंगाई ने कंपनियों के मुनाफे को निचोड़ दिया है।
डिमांड बनी हुई है दमदार
जुलाई-सितंबर 2026 की तिमाही में पैसेंजर और कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में डिमांड काफी मजबूत रही है। फेस्टिव सीजन की खरीदारी ने वॉल्यूम ग्रोथ को सहारा दिया है, जिससे ज्यादातर बड़ी ऑटो कंपनियों (OEMs) का रेवेन्यू साल-दर-साल आधार पर बढ़ने की उम्मीद है। यह साफ है कि हालिया प्राइस हाइक के बावजूद ग्राहकों का उत्साह कम नहीं हुआ है।
मार्जिन पर कच्चे माल की मार
रेवेन्यू में इजाफे के बावजूद, बॉटम लाइन यानी शुद्ध मुनाफे को लेकर निवेशक सतर्क हैं। कच्चा माल महंगा होने से मार्जिन पर दबाव बन गया है। स्थिति ऐसी है कि कंपनियां बढ़ी हुई लागत को पूरी तरह से ग्राहकों पर नहीं डाल पा रही हैं। इस दबाव का सबसे ज्यादा असर ऑटो एंसिलरी और टायर बनाने वाली कंपनियों पर देखा जा रहा है, जिनकी लागत सीधे रबर और एनर्जी की कीमतों से जुड़ी है।
प्राइस हाइक पर निवेशकों की नजर
लागत बढ़ने के कारण कई कंपनियों ने अक्टूबर 2026 से अपनी गाड़ियों के दाम 1% से 3% तक बढ़ा दिए हैं। अब निवेशकों की नजर इन नतीजों पर होगी कि क्या ये छोटी बढ़ोतरी मार्जिन को स्थिर करने के लिए काफी है या आगे और भी दाम बढ़ाने पड़ेंगे।
आने वाले समय में यह देखना सबसे जरूरी होगा कि फेस्टिव सीजन खत्म होने के बाद डिमांड कैसी रहती है। अगर डिमांड बनी रहती है, तो कंपनियों को लागत का बोझ ग्राहकों पर डालने की ताकत मिलेगी। अन्यथा, मार्जिन और मार्केट शेयर के बीच कंपनियों को संघर्ष करना पड़ सकता है।
