Anand Rathi की सलाह: FY27 में स्मॉल-कैप से दूरी, लार्ज-कैप पर दांव!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Anand Rathi की सलाह: FY27 में स्मॉल-कैप से दूरी, लार्ज-कैप पर दांव!

Anand Rathi Share and Stock Brokers के डायरेक्टर नीरज गौर ने निवेशकों को आगाह किया है कि वे FY27 के लिए अपने इक्विटी पोर्टफोलियो में थोड़ा चुनिंदा रुख अपनाएं। उन्होंने सलाह दी है कि स्मॉल-कैप शेयरों में निवेश कम करके लार्ज-कैप और चुनिंदा बैंकिंग शेयरों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

Detailed Coverage

क्यों घटाएं स्मॉल-कैप में हिस्सेदारी?

बाजार की मौजूदा स्थिति को देखते हुए, ब्रोकरेज का मानना है कि लॉन्ग-टर्म में अर्निंग्स ग्रोथ (Earnings Growth) तो बढ़ेगी, लेकिन फिलहाल स्मॉल-कैप स्टॉक्स (Small-Cap Stocks) में रिस्क ज्यादा है। ये शेयर लार्ज-कैप की तुलना में बाजार की उठापटक (Volatility) को ज्यादा बढ़ाते हैं।

लार्ज-कैप और बैंकिंग पर फोकस

Anand Rathi के अनुसार, लार्ज-कैप और मिड-कैप (Mid-Cap) के कुछ चुनिंदा सेग्मेंट्स में अभी वैल्यूएशन (Valuation) ज्यादा बेहतर है। प्राइवेट बैंक (Private Banks) खासतौर पर आकर्षक दिख रहे हैं, क्योंकि क्रेडिट साइकिल (Credit Cycle) सुधर रहा है और उनकी अर्निंग्स विजिबिलिटी (Earnings Visibility) मजबूत है।

दूसरी ओर, रियल एस्टेट (Real Estate) सेक्टर और IT सेक्टर पर ब्रोकरेज की 'अंडरवेट' (Underweight) पोजीशन है। IT सेक्टर की हालिया उछाल को सिर्फ एक तकनीकी सुधार (Tactical Relief Bounce) माना जा रहा है, न कि फंडामेंटल बदलाव। यह भी देखा गया है कि भारतीय IT स्टॉक्स, Accenture जैसे ग्लोबल प्लेयर्स की तुलना में महंगे हैं, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का आउटसोर्सिंग डिमांड पर लॉन्ग-टर्म असर अभी भी एक बड़ा सवाल है।

जियो-पॉलिटिकल और मैक्रो इकोनॉमिक्स वॉच

मार्केट की चाल 10% से 10.5% की अनुमानित नॉमिनल GDP ग्रोथ पर टिकी है। भारतीय शेयर बाजार ने वेस्ट एशिया (West Asia) के जियो-पॉलिटिकल टेंशन (Geopolitical Tension) को झेला है, लेकिन निवेशकों को कच्चे तेल की कीमतों पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए। अगर कच्चा तेल लगातार $90 प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है, तो इससे महंगाई बढ़ सकती है। इसका असर ग्लोबल बॉन्ड यील्ड्स (Global Bond Yields) पर दिखेगा और अनुमानित डबल-डिजिट अर्निंग्स ग्रोथ (Double-Digit Earnings Growth) में बाधा आ सकती है।

सेक्टर ट्रेंड्स और इंस्टीट्यूशनल फ्लो

फार्मा सेक्टर (Pharma Sector) में उठापटक को ब्रोकरेज ने अमेरिकी टैरिफ पॉलिसी (US Tariff Policy) की खबरों पर प्रतिक्रिया माना है, न कि बिजनेस के फंडामेंटल में बदलाव। कैपिटल गुड्स (Capital Goods) और इंडस्ट्रियल्स (Industrials) सेक्टर को 'ओवरवेट' (Overweight) रखा गया है।

इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (Institutional Investors) का रुख मिला-जुला रहने की उम्मीद है। फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) की चाल रुपये की स्थिरता पर निर्भर करेगी, जबकि डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) का फ्लो लगातार बना रहने का अनुमान है, जो रिटेल निवेशकों के SIP (Systematic Investment Plan) के कारण संभव है। FIIs के री-एलोकेशन पैटर्न (Reallocation Patterns) और रुपये की स्थिरता पर नजर रखना बाजार की दिशा के लिए अहम होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.