Affordable Housing Finance कंपनियों की पुरानी ब्रांचों में ग्रोथ की रफ्तार कम हो रही है, जिससे उन्हें अब नए इलाकों में विस्तार के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
एफोर्डेबल हाउसिंग फाइनेंस कंपनियां (AHFCs) अब एक ऐसे मोड़ पर हैं जहां उनके पुराने बिजनेस मॉडल को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि जिन ब्रांचों का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) ₹50 करोड़ से ₹60 करोड़ के बीच है, वहां अब डबल डिजिट में ग्रोथ बनाए रखना मुश्किल हो गया है। इन मैच्योर मार्केट्स में केवल प्रोडक्टिविटी बढ़ाने से काम नहीं चल रहा, इसलिए कंपनियों को अब नए इलाकों में ब्रांच खोलकर बिजनेस बढ़ाना पड़ रहा है।
विस्तार का खर्च और रणनीति
नए क्षेत्रों में कदम रखने के साथ ही खर्च का दबाव भी बढ़ रहा है। इन्फ्रास्ट्रक्चर, स्टाफ की भर्ती और टेक्नोलॉजी पर होने वाला शुरुआती निवेश सीधे तौर पर कंपनी के 'कॉस्ट-टू-इनकम' रेशियो को प्रभावित कर सकता है। निवेशकों के लिए यह देखना जरूरी है कि कंपनियां कितनी जल्दी इन नई ब्रांचों को ब्रेक-ईवन (Break-even) पर ला पाती हैं, ताकि प्रॉफिट मार्जिन पर ज्यादा असर न पड़े।
कॉम्पिटिशन और स्टाफ रिटेंशन का जोखिम
हाउसिंग लोन के बाजार में कॉम्पिटिशन काफी बढ़ गया है। अनलिस्टेड प्लेयर्स और बड़ी NBFCs लगातार आक्रामक ऑफर और टॉप-अप लोन के जरिए मार्केट शेयर हथियाने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में फील्ड-बेस्ड अंडरराइटिंग और लोन मंजूरी की स्पीड ही गेम चेंजर साबित हो रही है।
हालांकि, सबसे बड़ा जोखिम स्टाफ की कमी का है। इस सेक्टर में सेल्स स्टाफ के बीच हाई एट्रिशन (Attrition) रेट एक गंभीर समस्या है। चूंकि यह बिजनेस व्यक्तिगत रिश्तों पर टिका है, इसलिए कर्मचारी के छोड़ने से पोर्टफोलियो के टूटने का डर बना रहता है। नए कर्मचारियों को भरोसे का नेटवर्क बनाने में समय लगता है, जो कंपनी की लोन बांटने की रफ्तार को धीमा कर देता है।
डिमांड और फाइनेंशियल सेहत
इन मुश्किलों के बावजूद डिमांड अब भी मजबूत बनी हुई है। मानसून और सीजनल फैक्टर्स की वजह से हाल के डिस्बर्समेंट आंकड़े नरम थे, लेकिन इंडस्ट्री को उम्मीद है कि अगले क्वार्टर में इसमें 3% से 7% तक की रिकवरी देखने को मिल सकती है। राहत की बात यह है कि एसेट क्वालिटी स्थिर है और नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) अभी भी 2% के नीचे बने हुए हैं।
