एसेट मैनेजर 360 ONE ने निवेशकों को सलाह दी है कि वे हाई-रिस्क वाली सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन (Chip Fabs) के बजाय इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज (EMS) जैसे Avalon Technologies और Syrma SGS पर ध्यान दें।
भारत का सेमीकंडक्टर सेक्टर अब कागजी घोषणाओं से निकलकर जमीन पर उतर रहा है। इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत 12 प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिली है, जिनमें $18 बिलियन का निवेश होने वाला है। हालांकि, एसेट मैनेजर 360 ONE का मानना है कि चिप फैब्रिकेशन का रास्ता चुनौतियों से भरा है, जिसे निवेशकों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
चिप फैब्रिकेशन का जोखिम
चिप बनाने वाली फैक्ट्री यानी 'फैब' लगाना किसी बड़े बुनियादी ढांचे के निर्माण जैसा है। इसमें शुरुआती लागत (Upfront Spending) बहुत अधिक होती है और प्लांट शुरू होने में कई साल लग जाते हैं। सबसे बड़ी चुनौती ऑपरेशनल रिस्क की है—यानी खराब चिप्स के मुकाबले सही चिप्स का उत्पादन (Yield) एक तकनीकी जटिल काम है। 360 ONE का कहना है कि जब तक प्लांट मुनाफा कमाने की स्थिति में पहुंचेंगे, तब तक कंपनियां लंबे समय तक घाटे में रह सकती हैं। किसी एक गलती या ऑर्डर मिलने में देरी कंपनी के फाइनेंशियल हेल्थ को बिगाड़ सकती है।
EMS कंपनियों में क्यों है स्टेबिलिटी?
360 ONE ने सुझाव दिया है कि रिस्क कम करने के लिए निवेशकों को Avalon Technologies और Syrma SGS Technology जैसी EMS कंपनियों को देखना चाहिए। ये कंपनियां सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये क्लीनरूम मेंटेनेंस, टेस्टिंग और असेंबली जैसी सेवाएं देती हैं। इनका बिजनेस मॉडल सीधे चिप मैन्युफैक्चरिंग के जोखिमों से मुक्त है, क्योंकि ये पहले से ही इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन में स्थापित हैं। इनकी ग्रोथ घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन बढ़ने से तय है, जो कि नए चिप प्लांट की तुलना में कहीं अधिक अनुमानित है।
निवेशकों के लिए जरूरी निगरानी
निवेशकों को केवल अरबों डॉलर के प्रोजेक्ट्स की खबरों के पीछे नहीं भागना चाहिए। असली पैमाना 'एग्जीक्यूशन' है। EMS कंपनियों के लिए मार्जिन और स्केल बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा, जबकि फैब्रिकेशन स्पेस में नजर इस पर होनी चाहिए कि कब व्यावसायिक उत्पादन (Commercial Production) शुरू होता है और ग्लोबल क्लाइंट्स के साथ कितने लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स होते हैं।
