Yes Bank ने अपने AT1 बॉन्डहोल्डर्स को कूपन पेमेंट करने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के **₹8,400 करोड़** के राइट-ऑफ को पलटने के आदेश के बावजूद, बैंक का कहना है कि यह पेमेंट 'डिस्क्रिशनरी' (विवेकाधीन) है और इसके लिए पहले कर्ज को आधिकारिक तौर पर किताबों में शामिल करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद उम्मीद थी कि निवेशकों को राहत मिलेगी, लेकिन Yes Bank ने 18 अक्टूबर को होने वाला कूपन पेमेंट नहीं किया है। बैंक अब कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ एक रिव्यू पिटीशन (समीक्षा याचिका) दाखिल करने की तैयारी कर रहा है।
विवाद की जड़: ₹8,400 करोड़ का राइट-ऑफ
साल 2020 में बैंक के रेस्क्यू प्लान के तहत ₹8,400 करोड़ के AT1 बॉन्ड्स को पूरी तरह राइट-ऑफ (खत्म) कर दिया गया था। बॉम्बे हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को अमान्य करार दिया था, जिससे बॉन्डहोल्डर्स को उम्मीद जगी थी कि उन्हें ब्याज मिलना शुरू हो जाएगा। हालांकि, बैंक ने अब एक नया पेंच फंसा दिया है।
बैंक का तर्क: अभी अनिवार्य नहीं है भुगतान
Yes Bank के मैनेजमेंट का कहना है कि AT1 बॉन्ड्स के नियम काफी जटिल होते हैं। जब तक इन बॉन्ड्स को बैंक की बैलेंस शीट और फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स में आधिकारिक तौर पर 'री-इंस्टेट' (पुनर्स्थापित) नहीं किया जाता, तब तक बैंक ब्याज देने के लिए बाध्य नहीं है। इसके अलावा, बैंक का तर्क है कि इन बॉन्ड्स पर ब्याज देना बैंक की वित्तीय स्थिति पर निर्भर करता है, जो फिलहाल काफी दबाव में है।
वित्तीय सेहत और 2028 तक का इंतजार
बैंक की हालिया एनुअल रिपोर्ट के मुताबिक, उसके प्रॉफिट एंड लॉस अकाउंट में ₹5,279 करोड़ का घाटा जमा है। जानकारों का मानना है कि पुराने घाटे को पूरी तरह से कवर करने में बैंक को 2028 तक का समय लग सकता है। इसका मतलब यह है कि कानूनी जीत के बावजूद, वित्तीय बाधाओं का हवाला देकर बैंक आगे भी भुगतान में देरी कर सकता है।
Axis Trustee का रुख
इस स्थिति से हताश होकर निवेशकों ने Axis Trustee Services Ltd से संपर्क किया है और ब्याज भुगतान पर लिखित स्पष्टीकरण मांगा है। अब निवेशकों की नजर बैंक की ओर से दाखिल होने वाली रिव्यू पिटीशन पर टिकी है, जो यह तय करेगी कि यह कानूनी लड़ाई अभी और कितनी लंबी खिंचेगी।
