Yes Bank ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें बैंक को Fortis Healthcare के शेयर सेल मामले में फॉरेंसिक ऑडिट के दायरे में रखा गया था। बैंक का कहना है कि वह मूल आर्बिट्रेशन केस का हिस्सा कभी नहीं रहा है।
कानूनी दांव-पेंच और ऑडिट का विवाद
मामला 31 अगस्त 2026 का है, जब दिल्ली हाई कोर्ट ने 17 वित्तीय संस्थानों के फॉरेंसिक ऑडिट के आदेश दिए थे। इसमें Yes Bank का नाम भी शामिल था। बैंक ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका में तर्क दिया है कि वह 2008 के उस आर्बिट्रेशन अवॉर्ड केस का हिस्सा नहीं था, जिसके आधार पर यह ऑडिट बिठाया गया है। यह पूरा विवाद Daiichi Sankyo और सिंह ब्रदर्स के बीच Ranbaxy Laboratories की बिक्री से जुड़ा है।
बैंक का स्पष्ट कहना है कि वह प्रमोटरों या Fortis Healthcare की जांच का विरोध नहीं कर रहा है, लेकिन हाई कोर्ट के उस आदेश के दायरे को गलत मानता है जिसमें उन संस्थानों को घसीटा गया है जो इस कानूनी लड़ाई का हिस्सा ही नहीं थे।
फाइनेंशियल सेहत और कैपिटल प्लान
यह कानूनी जंग ऐसे समय पर छिड़ी है जब Yes Bank अपनी ग्रोथ को रफ्तार देने के लिए ₹16,000 करोड़ जुटाने की तैयारी कर रहा है। इसमें ₹7,500 करोड़ इक्विटी के जरिए और ₹8,500 करोड़ कर्ज के जरिए जुटाने की योजना है।
बैंक की फाइनेंशियल परफॉरमेंस की बात करें तो हाल ही में कंपनी ने शानदार नतीजे पेश किए हैं। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में बैंक का नेट प्रॉफिट ₹1,071 करोड़ रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 33.7% की जबरदस्त ग्रोथ दर्शाता है।
निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?
भले ही इस ऑडिट से बैंक पर तत्काल कोई आर्थिक जुर्माना नहीं लगा है, लेकिन इस तरह की कानूनी अनिश्चितता निवेशकों के लिए चिंता का सबब बन सकती है। बाजार की नजर अब इस पर टिकी है कि सुप्रीम कोर्ट बैंक की याचिका पर क्या रुख अपनाता है। बैंक प्रबंधन का दावा है कि उसके सभी ट्रांजेक्शन नियम के दायरे में थे, लेकिन आने वाले समय में कैपिटल जुटाने की प्रक्रिया की टाइमलाइन पर निवेशकों की पैनी नजर बनी रहेगी।
