कॉलेज में एडमिशन मिलना हायर एजुकेशन की फंडिंग का सिर्फ पहला कदम है। बैंक को-बॉरोअर के क्रेडिट, कोर्स की मान्यता और डॉक्यूमेंटेशन जैसी चीजों को बहुत बारीकी से जांचते हैं। अगर ये स्टैंडर्ड पूरे नहीं होते, तो लोन रिजेक्ट हो सकता है। इसलिए, इन बैंकिंग नियमों को समझना बहुत जरूरी है ताकि फंडिंग प्लान में देरी न हो।
बहुत से स्टूडेंट्स और पेरेंट्स सोचते हैं कि किसी अच्छे कॉलेज में एडमिशन मिल जाए तो एजुकेशन लोन मिलना पक्का है। लेकिन सच्चाई यह है कि बैंक और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFCs) एजुकेशन लोन को एक सीरियस फाइनेंशियल प्रोडक्ट मानते हैं और फंड देने से पहले कड़े नियमों को लागू करते हैं। कभी-कभी तो सीट मिलने के बाद भी लोन रिजेक्ट हो जाता है, जिससे परिवारों को आखिरी वक्त पर पैसों का जुगाड़ करने के लिए भागना पड़ता है।
लोन रिजेक्शन का सबसे आम कारण:
लोन रिजेक्ट होने की सबसे आम वजहों में से एक है को-बॉरोअर (आमतौर पर पेरेंट या गार्जियन) की फाइनेंशियल प्रोफाइल। चूंकि ज्यादातर स्टूडेंट्स की अपनी कोई कमाई नहीं होती और न ही लंबा क्रेडिट हिस्ट्री होता है, इसलिए लोन देने वाली संस्थाएं को-बॉरोअर की पेमेंट करने की क्षमता पर बहुत ज्यादा भरोसा करती हैं। अगर पेरेंट का क्रेडिट स्कोर खराब है, उनके ऊपर पहले से ही काफी EMI का बोझ है, या उन्होंने पेमेंट में देरी की है, तो बैंक लोन को हाई-रिस्क मान सकता है। अप्लाई करने से पहले, को-बॉरोअर की क्रेडिट रिपोर्ट चेक करना समझदारी है ताकि कोई एरर या बकाया राशि न रह जाए जो रिजेक्शन का कारण बन सके।
कॉलेज और कोर्स की मान्यता भी है जरूरी:
लोन देने वाली संस्थाओं के पास अपने अप्रूव्ड संस्थानों और कोर्सेस की एक लिस्ट होती है। हर मान्यता प्राप्त डिग्री प्रोग्राम को एक जैसे लोन टर्म्स नहीं मिलते। बैंक अक्सर संस्थानों को उनकी रैंकिंग, प्लेसमेंट रिकॉर्ड और मान्यता के आधार पर कैटेगरी में बांटते हैं। अगर कोई कोर्स या कॉलेज इन अंदरूनी पैमानों पर खरा नहीं उतरता, तो अनसिक्योर्ड लोन एप्लीकेशन रिजेक्ट हो सकती है। इसके अलावा, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के नियमों के अनुसार, लेंडर्स को बॉरोअर की फ्यूचर कमाई और कैश फ्लो को वेरिफाई करना होता है, इसलिए कोर्स की एम्प्लॉयबिलिटी (नौकरी मिलने की संभावना) भी बैंक के फैसले में एक अहम फैक्टर बन जाती है।
डॉक्यूमेंटेशन का पेंच:
डॉक्यूमेंटेशन भी अक्सर एक बड़ी रुकावट साबित होता है। इनकंप्लीट एप्लीकेशन, अलग-अलग डॉक्यूमेंट्स में नाम की स्पेलिंग में गड़बड़ी, या कॉलेज की फी स्ट्रक्चर और मांगी गई रकम में अंतर प्रोसेसिंग में देरी या रिजेक्शन का कारण बन सकते हैं। बैंकों को फी स्ट्रक्चर, एडमिशन प्रूफ और को-बॉरोअर के इनकम प्रूफ के साफ सबूत चाहिए होते हैं। मांगी गई रकम अगर डॉक्यूमेंटेड एकेडमिक कॉस्ट से काफी ज्यादा है, तो भी अप्रूवल प्रोसेस मुश्किल हो सकता है, क्योंकि बैंक को मांगी गई रकम को एक्चुअल जरूरत के हिसाब से जस्टिफाई करना पड़ता है।
सरकारी स्कीम्स और आगे का रास्ता:
हालांकि, हायर एजुकेशन को ज्यादा सुलभ बनाने के लिए सरकारी स्कीम्स (जैसे PM-Vidyalaxmi फ्रेमवर्क के तहत) मौजूद हैं, लेकिन वे भी कुछ गाइडलाइंस के साथ ही काम करती हैं। लोन के लिए अप्लाई करने वाले परिवारों को पारदर्शिता और कंप्लीटनेस पर ध्यान देना चाहिए। अगर एप्लीकेशन रिजेक्ट होती है, तो यह शायद ही किसी एक मनमानी वजह से होती है। खास वजह को समझना - चाहे वो क्रेडिट हिस्ट्री हो, कोर्स की एलिजिबिलिटी हो, या कोलैटरल की जरूरतें - बहुत जरूरी है। नई एप्लीकेशन सबमिट करने से पहले इन मुद्दों को ठीक करना ही लोन मिलने की संभावनाओं को बेहतर बनाने का सबसे असरदार तरीका है।
