भारतीय बैंक अक्सर मुश्किलों में फंसी कंपनियों को बचाने (Restructuring) की बजाय उन्हें बंद (Liquidation) करने का रास्ता चुनते हैं, भले ही बचाने की प्रक्रिया में ज्यादा फायदा हो। यह 'लिक्विडेशन माइंडसेट' कर्ज समाधान को जटिल बनाता है और हितधारकों की उम्मीदों पर असर डालता है।
क्यों पसंद करते हैं बैंक लिक्विडेशन?
भारतीय डेट रेजोल्यूशन सिस्टम में एक बड़ी चुनौती यह है कि बैंक अक्सर किसी Struggling कंपनी को पुनर्जीवित करने की योजना पर काम करने के बजाय उसे liquidate करना पसंद करते हैं। यह प्रवृत्ति सिर्फ इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की वजह से नहीं है, बल्कि यह एक गहरे 'लिक्विडेशन माइंडसेट' का नतीजा है जो लोन मंजूर होने के समय से ही बना हुआ है।
लोन की शुरुआत से ही जोखिम का गणित
असली समस्या तब शुरू होती है जब बैंक पहली बार लोन देते समय जोखिम का आकलन करते हैं। कंपनी के मुश्किल में पड़ने से सालों पहले ही, बैंक अपनी रिकवरी की गणित इस तरह से तैयार करते हैं कि सबसे खराब स्थिति में यानी एसेट्स बेचकर पैसा वसूल किया जा सके। यही प्री-सेट कैलकुलेशन बैंक की इंटरनल रिकवरी एक्सपेक्टेशन का बेंचमार्क बन जाता है। जब कंपनी इंसॉल्वेंसी में जाती है, तो बैंक अधिकारियों के लिए इन शुरुआती, कंजरवेटिव रिकवरी टारगेट्स से हटना मुश्किल हो जाता है, भले ही रीस्ट्रक्चरिंग प्लान से लंबी अवधि में ज्यादा वैल्यू मिल सकती हो।
IBC प्रक्रिया में कैसे आती हैं बाधाएं?
यह व्यवहार इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया के लिए एक स्ट्रक्चरल हर्डल पैदा करता है। IBC को भले ही वैल्यू प्रिजर्वेशन और रेजोल्यूशन को प्राथमिकता देने के लिए डिजाइन किया गया हो, लेकिन लोन के समय इस्तेमाल की गई पुरानी कैलकुलेशन अक्सर बिजनेस रिवाइवल के संभावित फायदों पर हावी हो जाती है। नतीजतन, कोड में सिर्फ संशोधन करने से भी शायद ही यह नतीजा बदले, क्योंकि यह बायस बैंकों के अपने इंटरनल क्रेडिट इवैल्यूएशन और रिस्क मैनेजमेंट फ्रेमवर्क में ही बना हुआ है।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
बैंकिंग सेक्टर के निवेशकों के लिए, यह प्राथमिकता व्यापक मायने रखती है। इसका मतलब है कि स्ट्रेस्ड एसेट्स के लिए रिकवरी एफिशिएंसी अक्सर इन प्री-सेट लिक्विडेशन एक्सपेक्टेशन्स से सीमित हो जाती है, बजाय इसके कि भविष्य की ग्रोथ के लिए इसे ऑप्टिमाइज़ किया जाए। यह तब और भी प्रासंगिक हो जाता है जब बैंकिंग सेक्टर महंगाई के जोखिम और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के आने वाले मॉनेटरी पॉलिसी जैसे मैक्रोइकॉनोमिक दबावों का सामना कर रहा है।
आगे की राह
जैसे-जैसे इंडस्ट्री ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां एनालिस्ट पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर बैंकों की कमाई की सस्टेनेबिलिटी पर बारीकी से नजर रख रहे हैं, डेट रेजोल्यूशन की एफिशिएंसी एक महत्वपूर्ण फैक्टर बनी हुई है। निवेशक अक्सर खराब लोन पर मजबूत रिकवरी रेट को एक हेल्दी बैलेंस शीट के संकेत के रूप में देखते हैं। जब कोई बैंक लगातार जटिल रीस्ट्रक्चरिंग के बजाय लिक्विडेशन का विकल्प चुनता है, तो यह जोखिम के प्रति एक अधिक रूढ़िवादी दृष्टिकोण का संकेत दे सकता है, जो रिकवरी वैल्यू में बड़े अपसाइड की क्षमता को सीमित कर सकता है।
भविष्य में, बाजार इस बात पर नजर रखेगा कि क्या लेंडिंग प्रैक्टिसेज में बदलाव या रेगुलेटरी गाइडेंस बैंकों को बिजनेस रेस्क्यू प्लान्स को अधिक प्रभावी ढंग से महत्व देने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। निवेशकों को यह भी मॉनिटर करना चाहिए कि विभिन्न बैंक अपने स्ट्रेस्ड एसेट्स को कैसे हैंडल करते हैं, क्योंकि जो केवल लिक्विडेशन के बजाय सफल रीस्ट्रक्चरिंग में सक्षम होंगे, वे लंबी अवधि में वैल्यू को प्रिजर्व करने और बनाने की बेहतर स्थिति में हो सकते हैं।
