FPIs की बिकवाली और ब्याज दरों में बदलाव के कारण बैंकिंग सेक्टर फिलहाल दबाव में है। इसके बावजूद एक्सपर्ट्स ने कुछ चुनिंदा बैंकों पर दांव लगाया है, जो आने वाले समय में बड़ा मुनाफा दे सकते हैं।
भारतीय बैंकिंग सेक्टर इस समय अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FPIs) द्वारा की जा रही लगातार बिकवाली से बैंकों के वैल्युएशन में गिरावट आई है। हालांकि, मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस गिरावट के बीच भी कुछ चुनिंदा बैंक ऐसे हैं जिनमें अगले 12 महीनों में 26% तक का रिटर्न देने की क्षमता है।
मार्जिन पर दबाव का डर
बैंकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इंटरेस्ट रेट साइकिल में हो रहा बदलाव है। जब उधार लेने की लागत बढ़ती है, तो बैंकों के लिए नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) को बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। अगर मार्जिन कम होता है, तो बैंकों का सीधा असर मुनाफे पर पड़ेगा। मार्केट इसी आशंका को लेकर सतर्क है कि आने वाली तिमाहियों में मार्जिन और टाइट हो सकते हैं।
इंश्योरेंस रेगुलेशन की मार
प्राइवेट बैंकों के लिए एक और बड़ी मुश्किल इंश्योरेंस कमीशन पर आ रहे नए रेगुलेटरी नियम हैं। कई बैंक इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स बेचकर अच्छी कमाई (Fee-based income) करते हैं। नए नियमों के चलते डिस्ट्रीब्यूशन कमीशन पर कैप लगने से बैंकों की कमाई का यह जरिया प्रभावित हो सकता है।
क्वार्टरली नतीजों पर टिकी नजरें
जैसे-जैसे दूसरी तिमाही के नतीजे नजदीक आ रहे हैं, निवेशकों का ध्यान एसेट क्वालिटी और नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) यानी बैड लोन्स पर शिफ्ट हो गया है। निवेशक यह देख रहे हैं कि क्या मौजूदा आर्थिक माहौल में लोन डिफॉल्ट बढ़ रहे हैं या नहीं। हालांकि, रिटेल और कॉर्पोरेट सेक्टर में क्रेडिट की डिमांड अभी भी मजबूत बनी हुई है, जो एक राहत की बात है।
आने वाले महीनों में निवेशकों के लिए प्रॉफिट मार्जिन का ट्रेंड, इंश्योरेंस रेगुलेशन का असर और एसेट क्वालिटी के आंकड़े सबसे जरूरी पैरामीटर्स होंगे। शॉर्ट टर्म प्राइस मूवमेंट्स के बजाय इन फंडामेंटल फैक्टर्स पर नजर रखना ही समझदारी होगी।
