पश्चिम बंगाल सरकार 118 साल पुराने कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज (CSE) को बचाने के लिए आगे आई है। सरकार इसके बंद होने की योजना को रोकना चाहती है और इसे स्थानीय व्यवसायों के लिए कैपिटल एक्सेस (Capital Access) बेहतर बनाने और राज्य के PSU (Public Sector Undertakings) को लिस्ट करने के लिए इस्तेमाल करना चाहती है।
पश्चिम बंगाल सरकार ने 118 साल पुराने कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज (CSE) को पुनर्जीवित करने का प्रस्ताव दिया है। यह कदम एक्सचेंज की स्वैच्छिक रूप से बंद होने की योजना से बिल्कुल अलग है। CSE, जिसने फरवरी 2025 में स्टॉक मार्केट ऑपरेशंस से औपचारिक निकास (Exit) के लिए आवेदन किया था, अब ट्रेडिंग एक्टिविटीज (Trading Activities) को फिर से शुरू करने के लिए एक स्ट्रेटेजिक रोडमैप (Strategic Roadmap) तैयार कर रहा है। राज्य के वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में इस पहल को एक मुख्य बिंदु के रूप में पेश किया गया है, जिसका लक्ष्य कोलकाता को एक वित्तीय केंद्र (Financial Hub) के रूप में स्थापित करना और पूर्वी भारत में पूंजी जुटाने (Capital Raising) के नए अवसर पैदा करना है।
व्यावसायिक पुनरुद्धार की चुनौतियां
हालांकि राज्य सरकार का यह प्रयास कॉर्पोरेट वैल्यू (Corporate Value) को अनलॉक करने और स्थानीय व्यवसायों के लिए कैपिटल एक्सेस (Capital Access) को बेहतर बनाने का लक्ष्य रखता है, लेकिन सफल पुनरारंभ का मार्ग जटिल है। CSE अप्रैल 2013 से रेगुलेटरी नॉन-कंप्लायंस (Regulatory Non-compliance) के मुद्दों के कारण ट्रेडिंग से निलंबित है। एक दशक से अधिक समय से निष्क्रिय पड़े स्टॉक एक्सचेंज को फिर से शुरू करने में महत्वपूर्ण ऑपरेशनल, टेक्निकल और रेगुलेटरी बाधाएं हैं। एक्सचेंज को अब सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) को यह विश्वास दिलाना होगा कि वह नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) जैसे बड़े प्लेयर्स के प्रभुत्व वाले बाजार में मजबूत निगरानी, टेक्नोलॉजी और गवर्नेंस स्टैंडर्ड्स (Governance Standards) बनाए रख सकता है।
एक और बड़ी चुनौती है इसकी व्यावसायिक व्यवहार्यता (Commercial Viability)। भारतीय शेयर बाजार अत्यधिक केंद्रित है, जिसमें अधिकांश ट्रेडिंग वॉल्यूम (Trading Volumes) NSE और BSE पर ही होता है। एक क्षेत्रीय प्लेटफॉर्म पर ट्रेडर्स, ब्रोकर्स और लिस्टेड कंपनियों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त लिक्विडिटी (Liquidity) का निर्माण करना एक कठिन काम बना हुआ है। मजबूत सरकारी समर्थन के बावजूद, एक्सचेंज को यह साबित करना होगा कि वह उन मार्केट पार्टिसिपेंट्स (Market Participants) को प्रतिस्पर्धी वैल्यू प्रपोजिशन (Value Proposition) दे सकता है जो पहले से ही राष्ट्रीय एक्सचेंजों की गहरी लिक्विडिटी और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के आदी हैं।
मालिकाना हक और वित्तीय स्थिति
वित्तीय रूप से, एक्सचेंज क्षेत्रीय एक्सचेंजों के लिए न्यूनतम नियामक आवश्यकताओं (Regulatory Requirements) को पूरा करता है, जिसका नेट वर्थ (Net Worth) ₹100 करोड़ से अधिक बताया गया है। इसके स्वामित्व ढांचे में विभिन्न हितधारक शामिल हैं: लगभग 49% शेयर ब्रोकर्स के पास हैं, जबकि शेष 51% कॉर्पोरेट शेयरधारकों के पास हैं। इस समूह में BSE, जिसके पास लगभग 4.99% हिस्सेदारी है, और वेस्ट बंगाल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन (WBIDFC), जिसके पास 3.38% हिस्सेदारी है, जैसी प्रमुख संस्थाएं शामिल हैं।
राज्य सरकार की रुचि इस एक्सचेंज में आंशिक रूप से लाभदायक राज्य सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (State Public Sector Undertakings) को सूचीबद्ध करने की एक व्यापक योजना से प्रेरित है। एक्सचेंज को पुनर्जीवित करके, प्रशासन इन कंपनियों के लिए डिसइन्वेस्टमेंट (Disinvestment) के माध्यम से पूंजी जुटाने के लिए एक समर्पित मंच बनाने की उम्मीद करता है। हालांकि, इस योजना की सफलता CSE प्रबंधन द्वारा अपनी आगामी बोर्ड मीटिंग के लिए अंतिम रूप दिए जा रहे स्ट्रेटेजिक रोडमैप (Strategic Roadmap) पर बहुत अधिक निर्भर करेगी। निवेशकों और हितधारकों के लिए अगला महत्वपूर्ण कदम एक्सचेंज और SEBI के बीच निकास आवेदन (Exit Application) को वापस लेने और आधुनिक नियामक मानकों को पूरा करने की योजना प्रस्तुत करने के संबंध में औपचारिक संचार होगा।
